महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1272, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे सब लोग ब्रह्मलोकसे नीचे आये हुए पुण्यात्मा मनुष्य हैं। उन सबका सबके प्रति साधुतापूर्ण बर्ताव होता है। वे ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) होते और कठोर तपस्या करते हैं। फिर समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये सूर्यलोकमें प्रवेश कर जाते हैं ॥ ३० ॥
षष्टिस्तानि सहस्राणि षष्टिमेव शतानि च ।
अरुणस्याग्रतो यान्ति परिवार्य दिवाकरम् ॥ ३१ ॥
उनमेंसे छाछठ हजार मनुष्य भगवान् सूर्यको चारों ओरसे घेरकर अरुणके आगे-आगे चलते हैं ॥ ३१ ॥
षष्टिं वर्षसहस्राणि षष्टिमेव शतानि च ।
आदित्यतापतप्तास्ते विशन्ति शशिमण्डलम् ॥ ३२ ॥
वे छाछठ हजार वर्षोंतक ही सूर्यदेवके तापमें तपकर अन्तमें चन्द्रमण्डलमें प्रवेश कर जाते हैं ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वणि माल्यवद्वर्णने
सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वमें माल्यवान्का वर्णनविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
* पहुचीसे लेकर कनिष्ठिका अंगुलिके मूलभागतक एक मुट्ठीकी लंबाईको ‘अरत्नि’ कहते हैं।