भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 127

पुराणैः कर्मभिर्देवं तुष्टाव बलसूदनम् ॥ १३ ॥ तब बृहस्पतिजीने देवर्षियों और गन्धर्वोंके साथ वहाँ जाकर बलसूदन इन्द्रके पुरातन कर्मोंका वर्णन करते हुए उनकी स्तुति की— ॥ १३ ॥ महासुरो हतः शक्र नमुचिर्दारुणस्त्वया । शम्बरश्च बलश्चैव तथोभौ घोरविक्रमौ ॥ १४ ॥ 'इन्द्र! आपने अत्यन्त भयंकर नमुचि नामक महान् असुरको मार गिराया है। शम्बर और बल दोनों भयंकर पराक्रमी दानव थे; परंतु उन्हें भी आपने मार डाला ॥ १४ ॥ शतक्रतो विवर्धस्व सर्वाञ्छत्रून् निषूदय । उत्तिष्ठ शक्र सम्पश्य देवर्षींश्च समागतान् ॥ १५ ॥ 'शतक्रतो! आप अपने तेजस्वी स्वरूपसे बढ़िये और समस्त शत्रुओंका संहार कीजिये। इन्द्रदेव! उठिये और यहाँ पधारे हुए देवर्षियोंका दर्शन कीजिये ॥ १५ ॥ महेन्द्र दानवान् हत्वा लोकास्त्रातास्त्वया विभो । अपां फेनं समासाद्य विष्णुतेजोऽतिबृंहितम् । त्वया वृत्रो हतः पूर्वं देवराज जगत्पते ॥ १६ ॥ 'प्रभो महेन्द्र! आपने कितने ही दानवोंका वध करके समस्त लोकोंकी रक्षा की है। जगदीश्वर देवराज! भगवान् विष्णुके तेजसे अत्यन्त शक्तिशाली बने हुए समुद्रफेनको लेकर आपने पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध किया ॥ १६ ॥ त्वं सर्वभूतेषु शरण्य ईड्य- स्त्वया समं विद्यते नेह भूतम् । त्वया धार्यन्ते सर्वभूतानि शक्र त्वं देवानां महिमानं चकर्थ ॥ १७ ॥ 'आप सम्पूर्ण भूतोंमें स्तवन करने योग्य और सबके शरणदाता हैं। आपकी समानता करनेवाला जगत्में दूसरा कोई प्राणी नहीं है। शक्र! आप ही सम्पूर्ण भूतोंको धारण करते हैं और आपने ही देवताओंकी महिमा बढ़ायी है ॥ १७ ॥ पाहि सर्वांश्च लोकांश्च महेन्द्र बलमाप्नुहि । एवं संस्तूयमानश्च सोऽवर्धत शनैः शनैः ॥ १८ ॥ 'महेन्द्र! आप शक्ति प्राप्त कीजिये और सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा कीजिये।' इस प्रकार स्तुति की जानेपर देवराज इन्द्र धीरे-धीरे बढ़ने लगे ॥ १८ ॥ स्वं चैव वपुरास्थाय बभूव स बलान्वितः । अब्रवीच्च गुरुं देवो बृहस्पतिमवस्थितम् ॥ १९ ॥ अपने पूर्व शरीरको प्राप्त करके वे बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो गये। तत्पश्चात् इन्द्रने वहाँ खड़े हुए अपने गुरु बृहस्पतिसे कहा— ॥ १९ ॥ किं कार्यमवशिष्टं वो हतस्त्वाष्ट्रो महासुरः ।