महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृत्रश्च सुमहाकायो यो वै लोकाननाशयत् ॥ २० ॥ ‘ब्रह्मन्! त्वष्टाका पुत्र विशालकाय महासुर वृत्र, जो सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर रहा था, मेरे द्वारा मारा गया; अब आपलोगोंका कौन-सा बचा हुआ कार्य करूँ?’ ॥ २० ॥
बृहस्पतिरुवाच
मानुषो नहुषो राजा देवर्षिगणतेजसा । देवराज्यमनुप्राप्तः सर्वान् नो बाधते भृशम् ॥ २१ ॥ बृहस्पति बोले— देवेन्द्र! मनुष्य-लोकका राजा नहुष देवर्षियोंके प्रभावसे देवताओंका राज्य पा गया है, जो हम सब लोगोंको बड़ा कष्ट दे रहा है ॥ २१ ॥
इन्द्र उवाच
कथं च नहुषो राज्यं देवानां प्राप दुर्लभम् । तपसा केन वा युक्तः किंवीर्यो वा बृहस्पते ॥ २२ ॥ (तत् सर्वं कथयध्वं मे यथेन्द्रत्वमुपेयिवान् ।) इन्द्र बोले— बृहस्पते! नहुषने देवताओंका दुर्लभ राज्य कैसे प्राप्त किया? वह किस तपस्यासे संयुक्त है? अथवा उसमें कितना बल और पराक्रम है? उसे किस प्रकार इन्द्रपदकी प्राप्ति हुई है? ये सारी बातें आप सब लोग मुझे बताइये ॥ २२ ॥
बृहस्पतिरुवाच
देवा भीताः शक्रमकामयन्त त्वया त्यक्तं महदैन्द्रं पदं तत् । तदा देवाः पितरोऽथर्षयश्च गन्धर्वमुख्याश्च समेत्य सर्वे ॥ २३ ॥ गत्वाब्रुवन् नहुषं तत्र शक्र त्वं नो राजा भव भुवनस्य गोप्ता । तानब्रवीन्नहुषो नास्मि शक्त आप्यायध्वं तपसा तेजसा माम् ॥ २४ ॥ बृहस्पति बोले— शक्र! आपने जब उस महान् इन्द्र-पदका परित्याग कर दिया, तब देवतालोग भयभीत होकर दूसरे किसी इन्द्रकी कामना करने लगे। तब देवता, पितर, ऋषि तथा मुख्य गन्धर्व—सब मिलकर राजा नहुषके पास गये। शक्र! वहाँ उन्होंने नहुषसे इस प्रकार कहा—‘आप हमारे राजा होइये और सम्पूर्ण विश्वकी रक्षा कीजिये।’ यह सुनकर नहुषने उनसे कहा—‘मुझमें इन्द्र बननेकी शक्ति नहीं है, अतः आपलोग अपने तप और तेजसे मुझे आप्यायित (पुष्ट) कीजिये’ ॥ २३-२४ ॥ एवमुक्तैर्वर्धितश्चापि देवै