भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1290

सिद्धचारणसंकीर्णः सागरः परिमण्डलः ।। ७ ।।
राजन्! जम्बूद्वीपका विस्तार पूरे १८,६०० योजन है। इसके चारों ओर जो खारे पानीका समुद्र है, उसका विस्तार जम्बूद्वीपकी अपेक्षा दूना माना गया है। उसके तटपर तथा टापूमों बहुत-से देश और जनपद हैं। उसके भीतर नाना प्रकारके मणि और मूँगे हैं, जो उसकी विचित्रता सूचित करते हैं। अनेक प्रकारके धातुओंसे अद्भुत प्रतीत होनेवाले बहुसंख्यक पर्वत उस सागरकी शोभा बढ़ाते हैं। सिद्धों तथा चारणोंसे भरा हुआ वह लवणसमुद्र सब ओरसे मण्डलाकार है ।। ५—७ ।।
शाकद्वीपं च वक्ष्यामि यथावदिह पार्थिव ।
शृणु मे त्वं यथान्यायं ब्रुवतः कुरुनन्दन ।। ८ ।।
राजन्! अब मैं शाकद्वीपका यथावत् वर्णन आरम्भ करता हूँ। कुरुनन्दन! मेरे इस न्यायोचित कथनको आप ध्यान देकर सुनें ।। ८ ।।
जम्बूद्वीपप्रमाणेन द्विगुणः स नराधिप ।
विष्कम्भेन महाराज सागरोऽपि विभागशः ।। ९ ।।
महाराज! नरेश्वर! वह द्वीप विस्तारकी दृष्टिसे जम्बूद्वीपके परिमाणसे दूना है। भरतश्रेष्ठ! उसका समुद्र भी विभागपूर्वक उससे दूना ही है ।। ९ ।।
क्षीरोदो भरतश्रेष्ठ येन सम्परिवारितः ।
तत्र पुण्या जनपदास्तत्र न म्रियते जनः ।। १० ।।
भरतश्रेष्ठ! उस समुद्रका नाम क्षीरसागर है, जिसने उक्त द्वीपको सब ओरसे घेर रखा है। वहाँ पवित्र जनपद हैं। वहाँ निवास करनेवाले लोगोंकी मृत्यु नहीं होती ।। १० ।।
कुत एव हि दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुता हि ते ।
शाकद्वीपस्य संक्षेपो यथावद् भरतर्षभ ।। ११ ।।
उक्त एष महाराज किमन्यत् कथयामि ते ।
फिर वहाँ दुर्भिक्ष तो हो ही कैसे सकता है? उस द्वीपके निवासी क्षमाशील और तेजस्वी होते हैं। भरतश्रेष्ठ महाराज! इस प्रकार शाकद्वीपका संक्षेपसे यथावत् वर्णन किया गया है। अब और आपसे क्या कहूँ? ।। ११ १/२ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

शाकद्वीपस्य संक्षेपो यथावदिह संजय ।। १२ ।।
उक्तस्त्वया महाप्राज्ञ विस्तरं ब्रूहि तत्त्वतः ।
धृतराष्ट्र बोले—महाबुद्धिमान् संजय! तुमने यहाँ शाकद्वीपका संक्षिप्तरूपसे यथावत् वर्णन किया है। अब उसका कुछ विस्तारके साथ यथार्थ परिचय दो ।। १२ १/२ ।।

संजय उवाच

तथैव पर्वता राजन् सप्तात्र मणिभूषिताः ।। १३ ।।