भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1293

वह उस द्वीपकी लंबाई और चौड़ाई सबको घेरकर खड़ा है। महाराज! उसके बीचमें शाक नामक एक बड़ा भारी वृक्ष है, जो जम्बूद्वीपके समान ही विशाल है। महाराज! वहाँकी प्रजा सदा उस शाकवृक्षके ही आश्रित रहती है। वहाँ बड़े पवित्र जनपद हैं। उस द्वीपमें भगवान् शंकरकी आराधना की जाती है ।। २७-२८ ।।

तत्र गच्छन्ति सिद्धाश्च चारणा दैवतानि च । धार्मिकाश्च प्रजा राजंश्चत्वारोऽतीव भारत ।। २९ ।। राजन्! भरतनन्दन! वहाँ सिद्ध, चारण और देवता जाते हैं। वहाँके चारों वर्णोंकी प्रजा अत्यन्त धार्मिक होती है ।। २९ ।।

वर्णाः स्वकर्मनिरता न च स्तेनोऽत्र दृश्यते । दीर्घायुषो महाराज जरामृत्युविवर्जिताः ।। ३० ।। सभी वर्णके लोग वहाँ अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मका पालन करते हैं। वहाँ कोई चोर नहीं दिखायी देता। महाराज! उस द्वीपके निवासी दीर्घायु तथा जरा और मृत्युसे रहित होते हैं ।। ३० ।।

प्रजास्तत्र विवर्धन्ते वर्षास्विव समुद्रगाः । नद्यः पुण्यजलास्तत्र गङ्गा च बहुधा गता ।। ३१ ।। जैसे वर्षा-ऋतुमें समुद्रगामिनी नदियाँ बढ़ जाती हैं, उसी प्रकार वहाँकी समस्त प्रजा सदा वृद्धिको प्राप्त होती रहती है। उस द्वीपमें अनेक पवित्र जलवाली नदियाँ बहती हैं। वहाँ गंगा भी अनेक धाराओंमें विभक्त देखी जाती हैं ।। ३१ ।।

सुकुमारी कुमारी च शीताशी वेणिका तथा । महानदी च कौरव्य तथा मণিজला नदी ।। ३२ ।। चक्षुर्वर्धनिका चैव नदी भरतसत्तम । तत्र प्रवृत्ताः पुण्योदा नद्यः कुरुकुलोद्वह ।। ३३ ।। कुरूनन्दन! भरतश्रेष्ठ! उस द्वीपमें सुकुमारी, कुमारी, शीताशी, वेणिका, महानदी, मণিজला तथा चक्षुर्वर्धनिका आदि पवित्र जलवाली नदियाँ बहती हैं ।। ३२-३३ ।।

सहस्त्राणां शतान्येव यतो वर्षति वासवः । न तासां नामधेयानि परिमाणं तथैव च ।। ३४ ।। शक्यन्ते परिसंख्यातुं पुण्यास्ता हि सरिद्वराः । तव पुण्या जनपदाश्चत्वारो लोकसम्मताः ।। ३५ ।। वहाँ लाखों ऐसी नदियाँ हैं, जिनसे जल लेकर इन्द्र वर्षा करते हैं। उनके नाम और परिमाणकी संख्या बताना कठिन ही नहीं, असम्भव है। वे सभी श्रेष्ठ नदियाँ परम पुण्यमयी हैं। उस द्वीपमें लोकसम्मानित चार पवित्र जनपद हैं ।। ३४-३५ ।।

मङ्गाश्च मशकाश्चैव मानसा मन्दगास्तथा । मङ्गा ब्राह्मणभूयिष्ठाः स्वकर्मनिरता नृप ।। ३६ ।।