महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1292, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें**धृतराष्ट्र बोले—**सूतपुत्र संजय! यह तो तुमने आज मुझसे महान् संशयकी बात कही है। भला, वहाँ रहनेमात्रसे प्रजा श्यामताको कैसे प्राप्त हो गयी? ।। २० ।।
संजय उवाच
सर्वेष्वेव महाराज द्वीपेषु कुरुनन्दन ।
गौरः कृष्णश्च वर्णौ द्वौ तयोर्वर्णान्तरं नृप ।। २१ ।।
श्यामो यस्मात् प्रवृत्तो वै तत् ते वक्ष्यामि भारत ।
आस्तेऽत्र भगवान् कृष्णस्तत्कान्त्या श्यामतां गतः ।। २२ ।।
**संजयने कहा—**महाराज कुरुनन्दन! सम्पूर्ण द्वीपोंमें गौर, कृष्ण तथा इन दोनों वर्णोंका सम्मिश्रण देखा जाता है। भारत! यह पर्वत जिस कारणसे श्याम होकर दूसरोंमें भी श्यामता उत्पन्न करनेवाला हुआ, वह आपको बताता हूँ। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण निवास करते हैं; अतः उन्हींकी कान्तिसे यह (स्वयं भी) श्यामताको प्राप्त हुआ है (और अपने समीप रहनेवाली प्रजामें भी श्यामता उत्पन्न कर देता है) ।। २१-२२ ।।
ततः परं कौरवेन्द्र दुर्गशैलो महोदयः ।
केसरः केसरयुतो यतो वातः प्रवर्तते ।। २३ ।।
कौरवराज! श्यामगिरिके बाद बहुत ऊँचा दुर्ग शैल है। उसके बाद केसर पर्वत है, जहाँसे चली हुई वायु केसरकी सुगन्ध लिये बहती है ।। २३ ।।
तेषां योजनविष्कम्भो द्विगुणः प्रविभागशः ।
वर्षाणि तेषु कौरव्य सप्तोक्तानि मनीषिभिः ।। २४ ।।
इन सब पर्वतोंका विस्तार दूना होता गया है। कुरुनन्दन! मनीषी पुरुषोंने उन पर्वतोंके समीप सात वर्ष बताये हैं ।। २४ ।।
महामेरुर्महाकाशो जलदः कुमुदोत्तरः ।
जलधारो महाराज सुकुमार इति स्मृतः ।। २५ ।।
महामेरु पर्वतके समीप महाकाशवर्ष है, जलद या मलयके निकट कुमुदोत्तरवर्ष है। महाराज! जलधार गिरिका पार्श्ववर्ती वर्ष सुकुमार बताया गया है ।। २५ ।।
रैवतस्य तु कौमारः श्यामस्य मणिकाञ्चनः ।
केसरस्याथ मोदाकी परेण तु महापुमान् ।। २६ ।।
रैवतक पर्वतका कुमारवर्ष तथा श्यामगिरिका मणिकांचनवर्ष है। इसी प्रकार केसरके समीपवर्ती वर्षको मोदाकी कहते हैं। उसके आगे महापुमान् नामक एक पर्वत है ।। २६ ।।
परिवार्य तु कौरव्य दैर्घ्यं ह्रस्वत्वमेव च ।
जम्बूद्वीपेन संख्यातस्तस्य मध्ये महाद्रुमः ।। २७ ।।
शाको नाम महाराज प्रजा तस्य सदानुगा ।
तत्र पुण्या जनपदाः पूज्यते तत्र शंकरः ।। २८ ।।