महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहाँ लुटेरे अथवा म्लेच्छ-जातिके लोग नहीं हैं ।। १४-१५ ।। गौरप्रायो जनः सर्वः सुकुमारश्च पार्थिव । अवशिष्टेषु सर्वेषु वक्ष्यामि मनुजेश्वर ।। १६ ।। मनुजेश्वर! इन वर्षोंके सभी लोग प्रायः गोरे और सुकुमार होते हैं। अब मैं शेष सम्पूर्ण द्वीपोंके विषयमें बताता हूँ ।। १६ ।। यथाश्रुतं महाराज तदव्यग्रमनाः शृणु । क्रौञ्चद्वीपे महाराज क्रौञ्चो नाम महागिरिः ।। १७ ।। महाराज! मैंने जैसा सुन रखा है, वैसा ही सुनाऊँगा। आप शान्तचित्त होकर सुनिये। क्रौंचद्वीपमें क्रौंच नामक विशाल पर्वत है ।। १७ ।। क्रौञ्चात् परो वामनको वामनादन्धकारकः । अन्धकारात् परो राजन् मैनाकः पर्वतोत्तमः ।। १८ ।। मैनाकात् परतो राजन् गोविन्दो गिरिरुत्तमः । गोविन्दात् परतो राजन् निबिडो नाम पर्वतः ।। १९ ।। राजन्! क्रौंचके बाद वामन पर्वत है, वामनके बाद अन्धकार और अन्धकारके बाद मैनाक नामक श्रेष्ठ पर्वत है। प्रभो! मैनाकके बाद उत्तम गोविन्द गिरि है। गोविन्दके बाद निबिड नामक पर्वत है ।। १८-१९ ।। परस्तु द्विगुणस्तेषां विष्कम्भो वंशवर्धन । देशांस्तत्र प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ।। २० ।। कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले महाराज! इन पर्वतोंके बीचका विस्तार उत्तरोत्तर दूना होता गया है। उनमें जो देश बसे हुए हैं, उनका परिचय देता हूँ; सुनिये ।। २० ।। क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोनुगः । मनोनुगात् परश्चोष्णो देशः कुरुकुलोद्वह ।। २१ ।। क्रौंचपर्वतके निकट कुशल नामक देश है। वामन-पर्वतके पास मनोनुग देश है। कुरुकुलश्रेष्ठ! मनोनुगके बाद उष्ण देश आता है ।। २१ ।। उष्णात् परः प्रावरकः प्रावारादन्धकारकः । अन्धकारकदेशात् तु मुनिदेशः परः स्मृतः ।। २२ ।। उष्णके बाद प्रावरक, प्रावरकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद उत्तम मुनिदेश बताया गया है ।। २२ ।। मुनिदेशात् परश्चैव प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः । सिद्धचारणसंकीर्णो गौरप्रायो जनाधिप ।। २३ ।। एते देशा महाराज देवगन्धर्वसेविताः ।