भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1298

मुनिदेशके बाद जो देश है, उसे दुन्दुभिस्वन कहते हैं। वह सिद्धों और चारणोंसे भरा हुआ है। जनेश्वर! वहाँके लोग प्रायः गोरे होते हैं। महाराज! इन सभी देशोंमें देवता और गन्धर्व निवास करते हैं ।। २३ १/२ ।।

पुष्करे पुष्करो नाम पर्वतो मणिरत्नवान् ।। २४ ।। पुष्करद्वीपमें पुष्कर नामक पर्वत है, जो मणियों तथा रत्नोंसे भरा हुआ है ।। २४ ।।

तत्र नित्यं प्रभवति स्वयं देवः प्रजापतिः । तं पर्युपासते नित्यं देवाः सर्वे महर्षयः ।। २५ ।। वाग्भिर्मनोऽनुकूलाभिः पूजयन्तो जनाधिप । वहाँ स्वयं प्रजापति भगवान् ब्रह्मा नित्य निवास करते हैं। जनेश्वर! सम्पूर्ण देवता और महर्षि मनोनुकूल वचनोंद्वारा प्रतिदिन उनकी पूजा करते हुए सदा उन्हींकी उपासनामें लगे रहते हैं ।। २५ १/२ ।।

जम्बूद्वीपात् प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधान्युत ।। २६ ।। द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां कुरुसत्तम । ब्रह्मचर्येण सत्येन प्रजानां हि दमेन च ।। २७ ।। आरोग्यायःप्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः । जम्बूद्वीपसे अनेक प्रकारके रत्न अन्यान्य सब द्वीपोंमें वहाँकी प्रजाओंके उपयोगके लिये भेजे जाते हैं। कुरुश्रेष्ठ! ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रियसंयमके प्रभावसे उन सब द्वीपोंकी प्रजाओंके आरोग्य और आयुका प्रमाण जम्बूद्वीपकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दूना माना गया है ।।

एको जनपदो राजन् द्वीपेष्वेतेषु भारत । उक्ता जनपदा येषु धर्मश्चैकः प्रदृश्यते ।। २८ ।। भरतवंशी नरेश! वास्तवमें इन देशोंमें एक ही जनपद है। जिन द्वीपोंमें अनेक जनपद बताये गये हैं, उनमें भी एक प्रकारका ही धर्म देखा जाता है ।। २८ ।।

ईश्वरो दण्डमुद्यम्य स्वयमेव प्रजापतिः । द्वीपानेतान् महाराज रक्षंस्तिष्ठति नित्यदा ।। २९ ।। महाराज! सबके ईश्वर प्रजापति ब्रह्मा स्वयं ही दण्ड लेकर इन द्वीपोंकी रक्षा करते हुए इनमें नित्य निवास करते हैं ।। २९ ।।

स राजा स शिवो राजन् स पिता प्रपितामहः । गोपायति नरश्रेष्ठ प्रजाः सजडपण्डिताः ।। ३० ।। नरश्रेष्ठ! प्रजापति ही वहाँके राजा हैं। वे कल्याणस्वरूप होकर सबका कल्याण करते हैं। राजन्! वे ही पिता और प्रपितामह हैं। जडसे लेकर चेतनतक समस्त प्रजाकी वे ही रक्षा करते हैं ।। ३० ।।

भोजनं चात्र कौरव्य प्रजाः स्वयमुपस्थितम् । सिद्धमेव महाबाहो तद्धि भुञ्जन्ति नित्यदा ।। ३१ ।।