महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाबाहु कुरुनन्दन! यहाँकी प्रजाओंके पास सदा पका-पकाया भोजन स्वयं उपस्थित हो जाता है और उसीको खाकर वे लोग रहते हैं ।। ३१ ।। ततः परं समा नाम दृश्यते लोकसंस्थितिः । चतुरस्रं महाराज त्रयस्त्रिंशत् तु मण्डलम् ।। ३२ ।। उसके बाद समानामवाली लोगोंकी बस्ती देखी जाती है। महाराज! वह चौकोर बसी हुई है। उसमें तैंतीस मण्डल हैं ।। ३२ ।। तत्र तिष्ठन्ति कौरव्य चत्वारो लोकसम्मताः । दिग्गजा भरतश्रेष्ठ वामनैरावतादयः ।। ३३ ।। कुरुनन्दन! भरतश्रेष्ठ! वहाँ लोकविख्यात वामन, ऐरावत, सुप्रतीक और अंजन—ये चार दिग्गज रहते हैं ।। सुप्रतीकस्तथा राजन् प्रभिन्नकरटामुखः । तस्याहं परिमाणं तु न संख्यातुमिहोत्सहे ।। ३४ ।। असंख्यातः स नित्यं हि तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । राजन्! इनमेंसे सुप्रतीक नामक गजराज, जिसके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती रहती है, उसका परिमाण कैसा और कितना है, यह मैं नहीं बता सकता। वह नीचे-ऊपर तथा अगल-बगलमें सब ओर फैला हुआ है। वह अपरिमित है ।। ३४ १/२ ।। तत्र वै वायवो वान्ति दिग्भ्यः सर्वाभ्य एव हि ।। ३५ ।। असम्बद्धा महाराज तान् निगृह्णन्ति ते गजाः । पुष्करैः पद्मसंकाशैर्विकसद्भिर्महाप्रभैः ।। ३६ ।। शतधा पुनरेवाशु ते तान् मुञ्चन्ति नित्यशः । श्वसद्भिर्मुच्यमानास्तु दिग्गजैरिह मारुताः ।। ३७ ।। आगच्छन्ति महाराज ततस्तिष्ठन्ति वै प्रजाः । वहाँ सब दिशाओंसे खुली हुई हवा आती है। उसे वे चारों दिग्गज ग्रहण करके रोक रखते हैं। फिर वे विकसित कमलसदृश परम कान्तिमान् शुण्डदण्डके अग्रभागसे उस हवाको सैकड़ों भागोंमें करके तुरंत ही सब ओर छोड़ते हैं, यह उनका नित्यका काम है। महाराज! साँस लेते हुए उन दिग्गजोंके मुखसे मुक्त होकर जो वायु यहाँ आती है, उसीसे सारी प्रजा जीवन धारण करती है ।।
धृतराष्ट्र उवाच परो वै विस्तरोऽत्यर्थं त्वया संजय कीर्तितः ।। ३८ ।। दर्शितं द्वीपसंस्थानमुत्तरं ब्रूहि संजय । धृतराष्ट्र बोले—संजय! तुमने द्वीपोंकी स्थितिके विषयमें तो बड़े विस्तारके साथ वर्णन किया है। अब जो अन्तिम विषय—सूर्य, चन्द्रमा तथा राहुका प्रमाण बताना शेष रह गया है,