भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1300

उसका वर्णन करो ।। ३८ ½ ।।

संजय उवाच

उक्ता द्वीपा महाराज ग्रहं वै शृणु तत्त्वतः ।। ३९ ।। स्वर्भानोः कौरवश्रेष्ठ यावदेव प्रमाणतः । परिमण्डलो महाराज स्वर्भानुः श्रूयते ग्रहः ।। ४० ।। **संजय बोले—**महाराज! मैंने द्वीपोंका वर्णन तो कर दिया। अब ग्रहोंका यथार्थ वर्णन सुनिये। कौरव-श्रेष्ठ! राहुकी जितनी बड़ी लंबाई-चौड़ाई सुननेमें आती है, वह आपको बताता हूँ। महाराज! सुना है कि राहु ग्रह मण्डलाकार है ।। ३९-४० ।। योजनानां सहस्राणि विष्कम्भो द्वादशास्य वै । परिणाहेन षट्त्रिंशद् विपुलत्वेन चानघ ।। ४१ ।। निष्पाप नरेश! राहु ग्रहका व्यासगत विस्तार बारह हजार योजन है और उसकी परिधिका विस्तार छत्तीस हजार योजन है ।। ४१ ।। षष्टिमाहुः शतान्यस्य बुधाः पौराणिकास्तथा । चन्द्रमास्तु सहस्राणि राजन्नेकादश स्मृतः ।। ४२ ।। पौराणिक विद्वान् उसकी विपुलता (मोटाई) छः हजार योजनकी बताते हैं। राजन्! चन्द्रमाका व्यास ग्यारह हजार योजन है ।। ४२ ।। विष्कम्भेन कुरुश्रेष्ठ त्रयस्त्रिंशत् तु मण्डलम् । एकोनषष्टिविष्कम्भं शीतरश्मेर्महात्मनः ।। ४३ ।। कुरुश्रेष्ठ! उनकी परिधि या मण्डलका विस्तार तैंतीस हजार योजन बताया गया है और महामना शीतरश्मि चन्द्रमाका वैपुल्यगत विस्तार (मोटाई) उनसठ सौ योजन है ।। ४३ ।। सूर्यस्त्वष्टौ सहस्राणि द्वे चान्ये कुरुनन्दन । विष्कम्भेन ततो राजन् मण्डलं त्रिंशता समम् ।। ४४ ।। अष्टपञ्चाशतं राजन् विपुलत्वेन चानघ । श्रूयते परमोदारः पतगोऽसौ विभावसुः ।। ४५ ।। कुरुनन्दन! सूर्यका व्यासगत विस्तार दस हजार योजन है और उनकी परिधि या मण्डलका विस्तार तीस हजार योजन है तथा उनकी विपुलता अट्ठावन सौ योजनकी है। अनघ! इस प्रकार शीघ्रगामी परम उदार भगवान् सूर्यके त्रिविध विस्तारका वर्णन सुना जाता है ।। ४४-४५ ।। एतत् प्रमाणमर्कस्य निर्दिष्टमिह भारत । स राहुश्छादयत्येतौ यथाकालं महत्तया ।। ४६ ।। चन्द्रादित्यौ महाराज संक्षेपोऽयमुदाहृतः । इत्येतत् ते महाराज पृच्छतः शास्त्रचक्षुषा ।। ४७ ।।