भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1317

सुनिये। अपने मनको शोकमें न डालिये। नरेश्वर! निश्चय ही दैवका यह सारा विधान मुझे पहलेसे ही प्रत्यक्ष हो चुका है ॥ ५-६ ॥ नमस्कृत्य पितुस्तेऽहं पाराशर्याय धीमते । यस्य प्रसादाद् दिव्यं तत् प्राप्तं ज्ञानमनुत्तमम् ॥ ७ ॥ दृष्टिश्चातीन्द्रिया राजन् दूराच्छ्रवणमेव च । परचित्तस्य विज्ञानमतीतानागतस्य च ॥ ८ ॥ व्युत्थितोत्पत्तिविज्ञानमाकाशे च गतिः शुभा । अस्त्रैरसंगो युद्धेषु वरदानान्महात्मनः ॥ ९ ॥ शृणु मे विस्तरेणेदं विचित्रं परमाद्भुतम् । भरतानामभूद् युद्धं यथा तल्लोमहर्षणम् ॥ १० ॥ राजन्! जिनके कृपाप्रसादसे मुझे परम उत्तम दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ है, इन्द्रियातीत विषयको भी प्रत्यक्ष देखनेवाली दृष्टि मिली है, दूरसे भी सब कुछ सुननेकी शक्ति, दूसरेके मनकी बातोंको समझ लेनेकी सामर्थ्य, भूत और भविष्यका ज्ञान, शास्त्रके विपरीत चलनेवाले मनुष्योंकी उत्पत्तिका ज्ञान, आकाशमें चलने-फिरनेकी उत्तम शक्ति तथा युद्धके समय अस्त्रोंसे अपने शरीरके अछूते रहनेका अद्भुत चमत्कार आदि बातें जिन महात्माके वरदानसे मेरे लिये सम्भव हुई हैं, उन्हीं आपके पिता पराशरनन्दन बुद्धिमान् व्यासजीको नमस्कार करके भरतवंशियोंके इस अत्यन्त अद्भुत, विचित्र एवं रोमांचकारी युद्धका वर्णन आरम्भ करता हूँ। आप मुझसे यह सब कुछ जिस प्रकार हुआ था, वह विस्तारपूर्वक सुनें ॥ ७—१० ॥ तेष्वनीकेषु यत्तेषु व्यूढेषु च विधानतः । दुर्योधनो महाराज दुःशासनमथाब्रवीत् ॥ ११ ॥ महाराज! जब समस्त सेनाएँ शास्त्रीय विधिके अनुसार व्यूह-रचनापूर्वक अपने-अपने स्थानपर युद्धके लिये तैयार हो गयीं, उस समय दुर्योधनने दुःशासनसे कहा— ॥ ११ ॥ दुःशासन रथास्तूर्णं युज्यन्तां भीष्मरक्षिणः । अनीकानि च सर्वाणि शीघ्रं त्वमनुचोदय ॥ १२ ॥ ‘दुःशासन! तुम भीष्मजीकी रक्षा करनेवाले रथोंको शीघ्र तैयार कराओ। सम्पूर्ण सेनाओंको भी शीघ्र उनकी रक्षाके लिये तैयार हो जानेकी आज्ञा दो ॥ १२ ॥ अयं स मामभिप्राप्तो वर्षपूगाभिचिन्तितः । पाण्डवानां ससैन्यानां कुरूणां च समागमः ॥ १३ ॥ ‘मैं वर्षोंसे जिसके लिये चिन्तित था, वह यह सेनासहित कौरव-पाण्डवोंका महान् संग्राम मेरे सामने उपस्थित हो गया है ॥ १३ ॥ नातः कार्यतमं मन्ये रणे भीष्मस्य रक्षणात् । हन्याद् गुप्तो ह्यसौ पार्थान् सोमकांश्च ससंजयान् ॥ १४ ॥