महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1318, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें‘इस समय युद्धमें भीष्मजीकी रक्षासे बढ़कर दूसरा कोई कार्य मैं आवश्यक नहीं समझता हूँ; क्योंकि वे सुरक्षित रहें तो कुन्तीके पुत्रों, सोमकवंशियों तथा सृञ्जयोंको भी मार सकते हैं ।। १४ ।।
अब्रवीच्च विशुद्धात्मा नाहं हन्यां शिखण्डिनम् । श्रूयते स्त्री ह्यसौ पूर्वं तस्माद् वर्ज्यो रणे मम ।। १५ ।। ‘विशुद्ध हृदयवाले पितामह भीष्म मुझसे कह चुके हैं कि ‘मैं शिखण्डीको युद्धमें नहीं मारूँगा; क्योंकि सुननेमें आया है कि वह पहले स्त्री था, अतः रणभूमिमें मेरे लिये वह सर्वथा त्याज्य है’ ।। १५ ।।
तस्माद् भीष्मो रक्षितव्यो विशेषेणेति मे मतिः । शिखण्डिनो वधे यत्ताः सर्वे तिष्ठन्तु मामकाः ।। १६ ।। ‘इसलिये मेरा विचार है कि इस समय हमें विशेष रूपसे भीष्मजीकी रक्षामें ही तत्पर रहना चाहिये। मेरे सारे सैनिक शिखण्डीको मार डालनेका प्रयत्न करें ।। १६ ।।
तथा प्राच्याः प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्योत्तरापथाः । सर्वशास्त्रेषु कुशलास्ते रक्षन्तु पितामहम् ।। १७ ।। ‘पूर्व, पश्चिम, दक्षिण तथा उत्तर दिशाके जो-जो वीर अस्त्रविद्यामें सर्वथा कुशल हों, वे ही पितामह (भीष्म)-की रक्षा करें ।। १७ ।।
अरक्ष्यमाणं हि वृको हन्यात् सिंहं महाबलम् । मा सिंहं जम्बुकेनेव घातयामः शिखण्डिना ।। १८ ।। ‘यदि महाबली सिंह भी अरक्षित-दशामें हो तो उसे एक भेड़िया भी मार सकता है। हमें चाहिये कि सियारके समान शिखण्डीके द्वारा सिंहसदृश भीष्मको न मरने दें ।। १८ ।।
वामं चक्रं युधामन्युरुत्तमौजाश्च दक्षिणम् । गोप्तारौ फाल्गुनं प्राप्तौ फाल्गुनोऽपि शिखण्डिनः ।। १९ ।। ‘अर्जुनके बायें पहियेकी रक्षा युधामन्यु और दाहिनेकी रक्षा उत्तमौजा कर रहे हैं। अर्जुनको ये दो रक्षक प्राप्त हैं और अर्जुन शिखण्डीकी रक्षा कर रहे हैं ।। १९ ।।
संरक्ष्यमाणः पार्थेन भीष्मेण च विवर्जितः । यथा न हन्याद् गाङ्गेयं दुःशासन तथा कुरु ।। २० ।। ‘अतः दुःशासन! भीष्मसे उपेक्षित तथा अर्जुनसे सुरक्षित होकर शिखण्डी जिस प्रकार गंगानन्दन भीष्मको न मार सके, वैसा प्रयत्न करो’ ।। २० ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि दुर्योधनदुःशासनसंवादे पञ्चदशोऽध्यायः ।। १५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत श्रीमद्भगवद्गीतापर्वमें दुर्योधन-दुःशासनसंवादविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५ ।।