महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमैं वेदोंमें सामवेद हूँ,^७ देवोंमें इन्द्र हूँ, इन्द्रियोंमें मन हूँ और भूतप्राणियोंकी चेतना अर्थात् जीवनी शक्ति हूँ^८ ॥ २२ ॥
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥
मैं एकादश रुद्रोंमें शंकर हूँ^१ और यक्ष तथा राक्षसोंमें धनका स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओंमें अग्नि हूँ^२ और शिखरवाले पर्वतोंमें सुमेरु पर्वत हूँ^३ ॥ २३ ॥
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
पुरोहितोंमें मुखिया बृहस्पति मुझको जान^४। हे पार्थ! मैं सेनापतियोंमें स्कन्द^५ और जलाशयोंमें समुद्र हूँ ॥ २४ ॥
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥
मैं महर्षियोंमें भृगु^६ और शब्दोंमें एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूँ^१। सब प्रकारके यज्ञोंमें जपयज्ञ^२ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय पहाड़ हूँ^३ ॥ २५ ॥
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥
मैं सब वृक्षोंमें पीपलका वृक्ष,^४ देवर्षियोंमें नारद मुनि^५, गन्धर्वोंमें चित्ररथ^६ और सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ^७ ॥ २६ ॥
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥
घोड़ोंमें अमृतके साथ उत्पन्न होनेवाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियोंमें ऐरावत नामक हाथी^८ और मनुष्योंमें राजा^१ मुझको जान ॥ २७ ॥
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥
मैं शस्त्रोंमें वज्र^२ और गौओंमें कामधेनु^३ हूँ। शास्त्रोक्त रीतिसे संतानकी उत्पत्तिका हेतु कामदेव^४ हूँ और सर्पोंमें सर्पराज वासुकि^५ हूँ ॥ २८ ॥
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥
मैं नागोंमें शेषनाग^६ और जलचरोंका अधिपति वरुणदेवता^७ हूँ और पितरोंमें अर्यमा^८ नामक पितर तथा शासन करनेवालोंमें यमराज^९ मैं हूँ ॥ २९ ॥