महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसात्त्विकभाव<sup>३</sup> हूँ ॥ ३६ ॥
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥
वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव<sup>३</sup> अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवोंमें धनंजय<sup>४</sup> अर्थात् तू, मुनियोंमें वेदव्यास<sup>५</sup> और कवियोंमें शुक्राचार्य कवि<sup>६</sup> भी मैं ही हूँ ॥ ३७ ॥
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्<sup>७</sup> ॥ ३८ ॥
मैं दमन करनेवालोंका दण्ड<sup>८</sup> अर्थात् दमन करनेकी शक्ति हूँ, जीतनेकी इच्छावालोंकी नीति<sup>१</sup> हूँ, गुप्त रखनेयोग्य भावोंका रक्षक मौन<sup>२</sup> हूँ और ज्ञानवानोंका तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ ॥ ३८ ॥
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत् स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥
और हे अर्जुन! जो सब भूतोंकी उत्पत्तिका कारण है, वह भी मैं ही हूँ;<sup>३</sup> क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो<sup>४</sup> ॥ ३९ ॥
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥
हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है, मैंने अपनी विभूतियोंका यह विस्तार तो तेरे लिये एकदेशसे अर्थात् संक्षेपसे कहा है ॥ ४० ॥
**सम्बन्ध—**अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से उनकी विभूति और योगशक्तिका वर्णन करनेकी प्रार्थना की थी, उसके अनुसार भगवान् अपनी दिव्य विभूतियोंका वर्णन समाप्त करके अब संक्षेपमें अपनी योगशक्तिका वर्णन करते हैं—
यद् यद् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ॥
तत् तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥
जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेजके अंशकी ही अभिव्यक्ति<sup>५</sup> जान ॥ ४१ ॥
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञानेत तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥