महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1559, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यानात् कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२ ॥
मर्मको न जानकर किये हुए अभ्याससे ज्ञान श्रेष्ठ है,१. ज्ञानसे मुझ परमेश्वरके स्वरूपका ध्यान श्रेष्ठ है;२. और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग श्रेष्ठ है;३. क्योंकि त्यागसे तत्काल ही परम शान्ति होती है४. ॥ १२ ॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकोंमें भगवान्की प्राप्तिके लिये अलग-अलग साधन बतलाकर उनका फल परमेश्वरकी प्राप्ति बतलाया गया, अतएव भगवान्को प्राप्त हुए सिद्ध भक्तोंके लक्षण जाननेकी इच्छा होनेपर अब सात श्लोकोंमें उन भगवत्प्राप्त भक्तोंके लक्षण बतलाये जाते हैं—
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥
जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है१. तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दुःखोंकी प्राप्तिमें सम२ और क्षमावान्३ है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है४, मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है५ और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है६, वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला७ मेरा भक्त मुझको प्रिय है८ ॥ १३-१४ ॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो९ यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
जिससे कोई भी जीव उद्वेगको प्राप्त नहीं होता१० और जो स्वयं भी किसी जीवसे उद्वेगको प्राप्त नहीं होता१. तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादिसे रहित है,२ वह भक्त मुझको प्रिय है ॥ १५ ॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
जो पुरुष आकांक्षासे रहित,३. बाहर-भीतरसे शुद्ध,४ चतुर,५ पक्षपातसे रहित और दुःखोंसे छूटा हुआ है,६ वह सब आरम्भोंका त्यागी७ मेरा भक्त मुझको प्रिय है ॥ १६ ॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥
जो न कभी हर्षित होता है,८ न द्वेष करता है,९ न शोक करता है,१० न कामना करता है१. तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है,२ वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय