महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1560, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै ।। १७ ।।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ३ ॥ १८ ॥
जो शत्रु-मित्रमें४ और मान-अपमानमें सम है तथा सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि
द्वन्द्वोंमें सम है५ और आसक्तिसे रहित है ।। १८ ।।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील और जिस किसी प्रकारसे भी
शरीरका निर्वाह होनेमें सदा ही संतुष्ट है तथा रहनेके स्थानमें ममता और आसक्तिसे रहित
है, वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है।॥ १९ ॥
सम्बन्ध-परमात्माको प्राप्त हुए सिद्ध भक्तोंके लक्षण बतलाकर अब उन लक्षणोंको
आदर्श मानकर बड़े प्रयत्नके साथ उनका भलीभाँति सेवन करनेवाले, परम श्रद्धालु,
शरणागत भक्तोंकी प्रशंसा करनेके लिये, उनको अपना अत्यन्त प्रिय बतलाकर भगवान्
इस अध्यायका उपसंहार करते हैं-
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥
परंतु जो श्रद्धायुक्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृतको ३
निष्काम प्रेम-भावसे सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं।॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२
॥ भीष्मपर्वणि तु षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या और
योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें भक्तियोग नामक बारहवाँ
अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥ भीष्मपर्वमें छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
१. 'त्वाम्' पद यद्यपि यहाँ भगवान् श्रीकृष्णका वाचक है, तथापि भिन्न-भिन्न अवतारोंमें भगवान्ने जितने सगुण रूप
धारण किये हैं एवं दिव्य धाममें जो भगवान्का सगुण रूप विराजमान है—जिसे अपनी-अपनी मान्यताके अनुसार लोग
अनेकों रूपों और नामोंसे बतलाते हैं— यहाँ 'त्वाम्' पदको उन सभीका वाचक मानना चाहिये; क्योंकि वे सभी भगवान्
श्रीकृष्णसे अभिन्न हैं। उन सगुण भगवान्का निरन्तर चिन्तन करते हुए परम श्रद्धा और प्रेमपूर्वक निष्कामभावसे जो
समस्त इन्द्रियोंको उनकी सेवामें लगा देना है, यही निरन्तर भजन-ध्यानमें लगे रहकर उनकी श्रेष्ठ उपासना करना है।