महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंधन-सम्पत्ति जीतकर ले आये थे। उन्होंने द्रविड़ोंको भी जीतकर अपनी सेनाका अनुगामी बनाया था॥ १२॥
यश्चैव देवान् खाण्डवे सव्यसाची गाण्डीवधन्वा प्रजिगाय सेन्द्रान्। उपाहरत् पाण्डवो जातवेदसे यशो मानं वर्धयन् पाण्डवानाम्॥ १३॥
गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले पाण्डुपुत्र सव्यसाची अर्जुन वे ही हैं, जिन्होंने खाण्डववनमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंपर विजय पायी थी और पाण्डवोंके यश तथा सम्मानकी वृद्धि करते हुए अग्निदेवको वह वन उपहारके रूपमें अर्पित किया था॥ १३॥
गदाभृतां नास्ति समोऽत्र भीमा- द्धस्त्यारोहो नास्ति समश्च तस्य। रथेऽर्जुनादाहुरहीनमेनं बाह्वोर्बलेनायुतनागवीर्यम्॥ १४॥
गदाधारियोंमें इस भूतलपर भीमसेनके समान दूसरा कोई नहीं है और न उनके-जैसा कोई हाथीसवार ही है। रथमें बैठकर युद्ध करनेकी कलामें भी वे अर्जुनसे कम नहीं बताये जाते हैं और बाहुबलमें तो वे दस हजार हाथियोंके समान शक्तिशाली हैं॥ १४॥
सुशिक्षितः कृतवैरस्तरस्वी दहेत् क्षुद्रांस्तरसा धार्तराष्ट्रान्। सदात्यमर्षी न बलात् स शक्यो युद्धे जेतुं वासवेनापि साक्षात्॥ १५॥
अस्त्र-विद्यामें उन्हें अच्छी शिक्षा मिली है। वे बड़े वेगशाली वीर हैं। उनके साथ मेरे पुत्रोंने वैर ठान रखा है और वे सदा अत्यन्त अमर्षमें भरे रहते हैं; अतः यदि युद्ध हुआ तो भीमसेन मेरे क्षुद्र स्वभाववाले पुत्रोंको वेगपूर्वक (अपनी कोपाग्निसे) जलाकर भस्म कर देंगे। साक्षात् इन्द्र भी उन्हें युद्धमें बलपूर्वक परास्त नहीं कर सकते॥ १५॥
सुचेतसौ बलिनौ शीघ्रहस्तौ सुशिक्षितौ भ्रातरौ फाल्गुनेन। श्येनौ यथा पक्षिपूगान् रुजन्तौ माद्रीपुत्रौ शेषयेतां न शत्रून्॥ १६॥
माद्रीनन्दन नकुल और सहदेव भी शुद्धचित्त और बलवान् हैं। अस्त्र-संचालनमें उनके हाथोंकी फुर्ती देखने ही योग्य है। स्वयं अर्जुनने अपने उन दोनों भाइयोंको युद्धकी अच्छी शिक्षा दी है। जैसे दो बाज पक्षियोंके समुदायको (सर्वथा) नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार वे दोनों भाई शत्रुओंसे भिड़कर उन्हें जीवित नहीं छोड़ सकते॥ १६॥
एतद् बलं पूर्णमस्माकमेवं