भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

सूत! भरतवंशियोंकी माताएँ, बड़ी-बूढ़ी स्त्रियाँ, रसोई बनानेवाली सेविकाएँ, दासियाँ, बहुएँ, पुत्र, भानजे, बहिनें और पुत्रियोंके पुत्र—ये सभी निष्कपट-भावसे रहते हैं न? ॥ १४ ॥ कच्चिद् राजा ब्राह्मणानां यथावत् प्रवर्तते पूर्ववत् तात वृत्तिम् । कच्चिद् दायान् मामकान् धार्तराष्ट्रो द्विजातीनां संजय नोपहन्ति ॥ १५ ॥ तात! क्या राजा दुर्योधन पहलेकी भाँति ब्राह्मणोंको जीविका देनेमें यथोचित रीतिसे तत्पर रहता है? संजय! मैंने ब्राह्मणोंको वृत्तिके रूपमें जो गाँव आदि दिये थे, उन्हें वह छीनता तो नहीं है? ॥ १५ ॥ कच्चिद् राजा धृतराष्ट्रः सपुत्र उपेक्षते ब्राह्मणातिक्रमान् वै । स्वर्गस्य कच्चिन्न तथा वर्त्मभूता- मुपेक्षते तेषु सदैव वृत्तिम् ॥ १६ ॥ पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र ब्राह्मणोंके प्रति किये गये अपराधोंकी उपेक्षा तो नहीं करते? ब्राह्मणोंको जो सदा वृत्ति दी जाती है, वह स्वर्गलोकमें पहुँचनेका मार्ग है; अतः राजा उस वृत्तिकी उपेक्षा या अवहेलना तो नहीं करते हैं? ॥ १६ ॥ एतज्ज्योतिश्चोत्तमं जीवलोके शुक्लं प्रजानां विहितं विधात्रा । ते चेद् दोषं न नियच्छन्ति मन्दाः कृत्स्नो नाशो भविता कौरवाणाम् ॥ १७ ॥ ब्राह्मणोंको दी हुई जीविकावृत्तिकी रक्षा परलोकको प्रकाशित करनेवाली उत्तम ज्योति है और इस जीव-जगत्में वह उज्ज्वल यशका विस्तार करनेवाली है। यह नियम विधाताने ही प्रजाके हितके लिये रच रखा है। यदि मन्दबुद्धि कौरव लोभवश ब्राह्मणोंकी जीविका- वृत्तिके अपहरणरूप दोषको काबूमें नहीं रखेंगे तो कौरवकुलका सर्वथा विनाश हो जायगा ॥ १७ ॥ कच्चिद् राजा धृतराष्ट्रः सपुत्रो बुभूषते वृत्तिममात्यवर्गे । कच्चिन्न भेदेन जिजीविषन्ति सुहृद्रूपा दुर्हृदैश्चैकमत्यात् ॥ १८ ॥ क्या पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र मन्त्रिवर्गको भी जीवन-निर्वाहके योग्य वृत्ति देनेकी इच्छा रखते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि वे भेदसे जीविका चलाना चाहते हों (शत्रुओंने उन्हें