भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 169

फोड़ लिया हो और वे उन्हींके दिये हुए धनसे जीवन-निर्वाह करना चाहते हों)। वे सुहृद्के रूपमें रहते हुए भी एकमत होकर शत्रु तो नहीं बन गये हैं? ॥ १८ ॥ कच्चिन्न पापं कथयन्ति तात ते पाण्डवानां कुरवः सर्व एव । द्रोणः सपुत्रश्च कृपश्च वीरो नास्मासु पापानि वदन्ति कच्चित् ॥ १९ ॥ तात संजय! कहीं सब कौरव मिलकर पाण्डवोंके किसी दोषकी चर्चा तो नहीं करते हैं? पुत्रसहित द्रोणाचार्य और वीर कृपाचार्य हमलोगोंपर किन्हीं दोषोंका आरोप तो नहीं करते हैं? ॥ १९ ॥ कच्चिद् राज्ये धृतराष्ट्रं सपुत्रं समेत्याहुः कुरवः सर्व एव । कच्चिद् दृष्ट्वा दस्युसङ्घान् समेतान् स्मरन्ति पार्थस्य युधां प्रणेतुः ॥ २० ॥ क्या कभी सब कौरव एकत्र हो पुत्रसहित धृतराष्ट्रके पास जाकर हमें राज्य देनेके विषयमें कुछ कहते हैं? क्या राज्यमें लुटेरोंके दलोंको देखकर वे कभी संग्रामविजयी अर्जुनको भी याद करते हैं? ॥ २० ॥ मौर्वीभुजाग्रप्रहितान् स्म तात दोधूयमानेन धनुर्गुणेन । गाण्डीवनुन्नान् स्तनयित्नुघोषा- नजिह्मगान् कच्चिदनुस्मरन्ति ॥ २१ ॥ संजय! प्रत्यंचाको बारंबार हिलाकर और कानोंतक खींचकर अँगुलियोंके अग्रभागसे जिनका संधान किया जाता है तथा जो गाण्डीव धनुषसे छूटकर मेघकी गर्जनाके समान सनसनाते हुए सीधे लक्ष्यतक पहुँच जाते हैं, अर्जुनके उन बाणोंको कौरवलोग बराबर याद करते हैं न? ॥ २१ ॥ न चापश्यं कंचिदहं पृथिव्यां योधं समं वाधिकमर्जुनेन । यस्यैकषष्टिर्निशितास्तीक्ष्णधाराः सुवाससः सम्मतो हस्तवापः ॥ २२ ॥ मैंने इस पृथ्वीपर अर्जुनसे बढ़कर या उनके समान दूसरे किसी योद्धाको नहीं देखा है; क्योंकि जब वे एक बार अपने हाथोंसे धनुषपर शर-संधान करते हैं, तब उससे सुन्दर पंख और पैनी धारवाले इकसठ तीखे बाण प्रकट होते हैं ॥ २२ ॥ गदापाणिर्भीमसेनस्तरस्वी प्रवेपयञ्छत्रुसङ्घाननीके ।