महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 170, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंनागः प्रभिन्न इव नड्वलेषु चंक्रम्यते कच्चिदेनं स्मरन्ति ॥ २३ ॥ जैसे मस्तकसे मदकी धारा बहानेवाला गजराज सरकंडोंसे भरे हुए स्थानोंमें निर्भय विचरता है, उसी प्रकार वेगशाली वीर भीमसेन हाथमें गदा लिये रणभूमिमें शत्रुसमुदायको कम्पित करते हुए विचरण करते हैं। क्या कौरवलोग उन्हें भी कभी याद करते हैं? ॥ २३ ॥
माद्रीपुत्रः सहदेवः कलिङ्गान् समागतानजयद् दन्तकूरे । वामेनास्यन् दक्षिणेनैव यो वै महाबलं कच्चिदेनं स्मरन्ति ॥ २४ ॥ जिसमें दाँत पीसकर अस्त्र-शस्त्र चलाये जाते हैं, उस भयंकर युद्धमें माद्रीनन्दन सहदेवने दाहिने और बायें हाथसे बाणोंकी वर्षा करके अपना सामना करनेके लिये आये हुए कलिंगदेशीय योद्धाओंको परास्त किया था। क्या इस महाबली वीरको भी कौरव कभी याद करते हैं? ॥ २४ ॥
पुरा जेतुं नकुलः प्रेषितोऽयं शिबींस्त्रिगर्तान् संजय पश्यतस्ते । दिशं प्रतीचीं वशमानयन्मे माद्रीसुतं कच्चिदेनं स्मरन्ति ॥ २५ ॥ संजय! पहले राजसूययज्ञमें तुम्हारे सामने ही शिबि और त्रिगर्तदेशके वीरोंको जीतनेके लिये इस नकुलको भेजा गया था; परंतु इसने सारी पश्चिम दिशाको जीतकर मेरे अधीन कर दिया। क्या कौरव इस वीर माद्रीकुमारका भी स्मरण करते हैं? ॥ २५ ॥
पराभवो द्वैतवने य आसीद् दुर्मन्त्रिते घोषयात्रागतानाम् । यत्र मन्दाञ्छत्रुवशं प्रयाता- नमोचयद् भीमसेनो जयश्च ॥ २६ ॥ कर्णकी खोटी सलाहके अनुसार घोषयात्रामें गये हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंकी द्वैतवनमें जो पराजय हुई थी, उसमें वे सभी मन्दबुद्धि कौरव शत्रुओंके अधीन हो गये थे। उस समय भीमसेन और अर्जुनने ही उन्हें बन्धनसे मुक्त किया था ॥ २६ ॥
अहं पश्चादर्जुनमभ्यरक्षं माद्रीपुत्रौ भीमसेनोऽप्यरक्षत् । गाण्डीवधन्वा शत्रुसङ्घानुदस्य स्वस्त्यागमत् कच्चिदेनं स्मरन्ति ॥ २७ ॥ उस युद्धमें मैंने पीछे रहकर यज्ञके द्वारा अर्जुनकी रक्षा की थी और भीमसेनने नकुल तथा सहदेवका संरक्षण किया था। गाण्डीवधारी अर्जुनने शत्रुओंके समुदायको मार गिराया