महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1730, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपने विशाल धनुषोंके कट जानेपर उन सातों महारथियोंने बड़ी उतावलीके साथ रथ-शक्तियाँ उठा लीं और भयंकर गर्जना की॥ ५५॥ अन्वयुर्भरतश्रेष्ठ सप्त श्वेतरथं प्रति । ततस्ता ज्वलिताः सप्त महेन्द्राशनिनिःस्वनाः॥ ५६॥ भरतश्रेष्ठ! वे सातों शक्तियाँ प्रज्वलित हो देवराज इन्द्रके वज्रकी भाँति भयंकर शब्द करती हुई श्वेतके रथकी ओर एक साथ चलीं॥ ५६॥ अप्राप्ताः सप्तभिर्भल्लैश्चिच्छेद परमास्त्रवित् । ततः समादाय शरं सर्वकायविदारणम् ॥ ५७॥ प्राहिणोद् भरतश्रेष्ठ श्वेतो रुक्मरथं प्रति । परंतु श्वेत उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता थे। उन्होंने सात भल्ल मारकर अपने निकट आनेसे पहले ही उन शक्तियोंके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् श्वेतने सबकी कायाको विदीर्ण कर देनेवाले एक बाणको लेकर उसे रुक्मरथकी ओर चलाया॥ ५७ १/२॥ तस्य देहे निपतितो बाणो वज्रातिगो महान् ॥ ५८ ॥ ततो रुक्मरथो राजन् सायकेन दृढाहतः। निषसाद रथोपस्थे कश्मलं चाविशन्महत् ॥ ५९ ॥ वज्रसे भी अधिक प्रभावशाली वह महान् बाण रुक्मरथके शरीरपर जा गिरा। राजन्! उस बाणसे अत्यन्त घायल होकर रुक्मरथ अपने रथके पिछले भागमें बैठ गया और अत्यन्त मूर्च्छित हो गया॥ ५८-५९॥ तं विसंज्ञं विमनसं त्वरमाणस्तु सारथिः । अपोवाह न सम्भ्रान्तः सर्वलोकस्य पश्यतः॥ ६०॥ उसे अचेत और अनमना देख सारथि तनिक भी घबराहटमें न पड़कर अत्यन्त उतावलीके साथ सबके देखते-देखते रणभूमिसे दूर हटा ले गया॥ ६०॥ ततोऽन्यान् षट् समादाय श्वेतो हेमविभूषितान् । तेषां षण्णां महाबाहुर्ध्वजशीर्षाण्यपातयत् ॥ ६१ ॥ तब महाबाहु श्वेतने दूसरे स्वर्णभूषित छः बाण लेकर उन छहों रथियोंके ध्वजके अग्रभाग काट गिराये ॥ ६१॥ हयांश्च तेषां निर्भिद्य सारथींश्च परंतप । शरैश्चैतान् समाकीर्य प्रायाच्छल्यरथं प्रति ॥ ६२ ॥ परंतप! फिर उनके घोड़ों और सारथियोंको विदीर्ण करके उनके शरीरोंमें भी बहुत-से बाण जड़ दिये। इसके बाद श्वेतने शल्यके रथपर धावा किया॥ ६२॥ ततो हलहलाशब्दस्तव सैन्येषु भारत । दृष्ट्वा सेनापतिं तूर्णं यान्तं शल्यरथं प्रति ॥ ६३ ॥