महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1731, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारत! तब सेनापति श्वेतको शीघ्रतापूर्वक शल्यके रथकी ओर जाते देख आपकी सेनाओंमें हाहाकार मच गया ।। ६३ ।। ततो भीष्मं पुरस्कृत्य तव पुत्रो महाबलः । वृतस्तु सर्वसैन्येन प्रायाच्छ्वैतरथं प्रति ।। ६४ ।। मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मद्रराजममोचयत् । तब आपके महाबली पुत्र दुर्योधनने भीष्मजीको आगे करके सम्पूर्ण सेनाके साथ श्वेतके रथपर चढ़ाई की और मृत्युके मुखमें पहुँचे हुए मद्रराज शल्यको छुड़ा लिया ।। ६४ १/२ ।।
ततो युद्धं समभवत् तुमुलं लोमहर्षणम् ।। ६५ ।। तावकानां परेषां च व्यतिषक्तरथद्विपम् । तदनन्तर आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें अत्यन्त भयंकर रोमांचकारी युद्ध होने लगा। रथसे रथ और हाथीसे हाथी गुँथ गये ।। ६५ १/२ ।।
सौभद्रे भीमसेने च सात्यकौ च महारथे ।। ६६ ।। कैकेये च विराटे च धृष्टद्युम्ने च पार्षते । एतेषु नरसिंहेषु चेदिमत्स्येषु चैव ह । ववर्ष शरवर्षाणि कुरुवृद्धः पितामहः ।। ६७ ।। पाण्डवपक्षकी ओरसे सुभद्रकुमार अभिमन्यु, भीमसेन, महारथी सात्यकि, केकयराजकुमार, राजा विराट तथा द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न—ये पुरुषसिंह और चेदि एवं मत्स्यदेशके क्षत्रिय युद्ध कर रहे थे। कुरुकुलके वृद्ध पुरुष पितामह भीष्मने इन सबपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। ६६-६७ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि श्वेतयुद्धे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें श्वेतयुद्धविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।।