महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1733, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपीड़ा दी। वे सूर्यके समान तेजस्वी थे। उन्होंने अपने सायकोंद्वारा सूर्यदेवको भी आच्छादित कर दिया।। ६-७।।
नुदन् समन्तात् समरे रविरुद्यन् यथा तमः। तेनाजौ प्रेषिता राजन् शराः शतसहस्रशः।। ८ ।। क्षत्रियान्तकराः संख्ये महावेगा महाबलाः। शिरांसि पातयामासुर्वीराणां शतशो रणे ।। ९ ।। जैसे सूर्य उदित होकर अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार वे सब ओर समरभूमिमें शत्रु-सेनाओंका संहार कर रहे थे। राजन्! उनके द्वारा चलाये हुए महान् वेग और बलसे सम्पन्न तथा क्षत्रियोंका विनाश करनेवाले लाखों बाणोंने रणभूमिमें सैकड़ों श्रेष्ठ वीरोंके मस्तक काट गिराये।। ८-९ ।।
गजान् कण्टकसन्नाहान् वज्रेणेव शिलोच्चयान्। रथा रधेषु संसक्ता व्यदृश्यन्त विशाम्पते ।। १० ।। उन बाणोंने वज्रके मारे हुए पर्वतोंकी भाँति काँटेदार कवचोंसे सुसज्जित हाथियोंको भी धराशायी कर दिया। प्रजानाथ! उस समय रथ रथोंसे सटे हुए दिखायी देते थे।। १० ।।
एके रथं पर्यवहंस्तुरगाः सतुरङ्गमम्। युवानं निहतं वीरं लम्बमानं सकार्मुकम् ।। ११ ।। कितने ही घोड़े अपनेसहित रथको लिये हुए दूर भागे जा रहे थे और उसपर मरा हुआ नवयुवक वीर रथी धनुषके साथ ही लटक रहा था।। ११ ।।
उदीर्णाश्च हया राजन् वहन्तस्तत्र तत्र ह। बद्धखड्गनिषङ्गाश्च विध्वस्तशिरसो हताः ।। १२ ।। शतशः पतिता भूमौ वीरशय्यासु शेरते। राजन्! वे प्रचण्ड घोड़े उस रथको लिये-दिये यत्र-तत्र घूम रहे थे। कमरमें तलवार और पीठपर तरकस बाँधे हुए सैकड़ों आहत वीर मस्तक कट जानेके कारण पृथ्वीपर गिरकर वीरोचित शय्याओंपर शयन कर रहे थे।। १२ १/२ ।।
परस्परेण धावन्तः पतिताः पुनरुत्थिताः ।। १३ ।। उत्थाय च प्रधावन्तो द्वन्द्वयुद्धमवाप्नुवन्। पीडिताः पुनरन्योन्यं लुठन्तो रणमूर्धनि ।। १४ ।। एक-दूसरेपर धावा करनेवाले कितने ही सैनिक गिर पड़ते और फिर उठकर खड़े हो जाते थे। खड़े होकर वे दौड़ते और परस्पर द्वन्द्वयुद्ध करने लगते थे। फिर आपसके प्रहारोंसे पीड़ित हो वे युद्धके मुहानेपर ही गिरकर लुढ़क जाते थे।। १३-१४ ।।
सचापाः सनिषङ्गाश्च जातरूपपरिष्कृताः। विस्रब्धहतवीराश्च शतशः परिपीडिताः ।। १५ ।। तेन तेनाभ्यधावन्त विसृजन्तश्च भारत।