महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1734, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारत! सैकड़ों वीर धनुष और तरकस लिये सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हो कितने ही विपक्षी वीरोंका विश्वस्त भावसे विनाश करके स्वयं भी शत्रुओंके प्रहारसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे और स्वयं भी अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए विभिन्न मार्गोंसे इधर-उधर भाग-दौड़ कर रहे थे ॥ १५ १/२ ॥
मत्तो गजः पर्यवर्तद्धयांश्च हतसादिनः ॥ १६ ॥ सरथा रथिनश्चापि विमृद्नन्तः समन्ततः । मतवाले हाथी उन घोड़ोंके पीछे पड़े थे, जिनके सवार मारे गये थे। इसी प्रकार रथोंसहित रथी चारों ओर भूतलपर पड़ी हुई लाशोंको रौंदते हुए विचरण करते थे ॥ १६ १/२ ॥
स्यन्दनादपतत् कश्चिन्निहतोऽन्येन सायकैः ॥ १७ ॥ हतसारथिरप्युच्चैः पपात काष्ठवद् रथः । कितने ही वीर दूसरोंके बाणोंसे मारे जाकर रथसे गिर पड़ते थे। कहीं सारथिके मारे जानेपर रथ साधारण काष्ठकी भाँति ऊँचेसे नीचे गिर पड़ता था ॥ १७ १/२ ॥
युध्यमानस्य संग्रामे व्यूढे रजसि चोत्थिते ॥ १८ ॥ धनुः कूजितविज्ञानं तत्रासीत् प्रतियुद्ध्यतः । गात्रस्पर्शेन योधानां व्यज्ञास्त परिपन्थिनम् ॥ १९ ॥ उस संग्राममें इतनी धूल उड़ी कि कुछ सूझ नहीं पड़ता था। केवल धनुषकी टंकारसे ही यह जाना जाता था कि प्रतिद्वन्द्वी युद्ध कर रहा है। कितने ही योद्धा दूसरे योद्धाओंके शरीरका स्पर्श करके ही यह समझ पाते थे कि यह शत्रुदलका है ॥ १८-१९ ॥
युद्ध्यमानं शरै राजन् सिञ्जिनीध्वजिनीरवात् । अन्योन्यं वीरसंशब्दो नाश्रूयत भटैः कृतः ॥ २० ॥ राजन्! कुछ लोग धनुषकी टंकार और सेनाका कोलाहल सुनकर ही यह समझ पाते थे कि कोई बाणोंद्वारा युद्ध कर रहा है। योद्धा एक-दूसरेके प्रति जो वीरोचित गर्जना करते थे, वह भी उस समय अच्छी तरह सुनायी नहीं देती थी ॥ २० ॥
शब्दायमाने संग्रामे पटहे कर्णदारिणि । युद्ध्यमानस्य संग्रामे कुर्वतः पौरुषं स्वकम् ॥ २१ ॥ नाश्रौषं नामगोत्राणि कीर्तनं च परस्परम् । कानोंका परदा फाड़नेवाले डंकेकी आवाजसे सारी रणभूमि गूँज उठी थी। अतः वहाँ अपने पुरुषार्थको प्रकट करनेवाले किसी योद्धाकी बात मुझे नहीं सुनायी देती थी। वे लोग जो आपसमें नाम-गोत्र आदिका परिचय देते थे, उसे भी मैं नहीं सुन पाता था ॥ २१ १/२ ॥
भीष्मचापच्युतैर्बाणैरार्तानां युध्यतां मृधे ॥ २२ ॥ परस्परेषां वीराणां मनांसि समकम्पयन् ।