महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1735, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धमें भीष्मजीके धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे समस्त योद्धा पीड़ित हो रहे थे। उन बाणोंने परस्पर सभी वीरोंके हृदय कँपा दिये थे॥ २२ १/२ ॥ तस्मिन्नत्याकुले युद्धे दारुणे लोमहर्षणे ॥ २३ ॥ पिता पुत्रं च समरे नाभिजानाति कश्चन । वह युद्ध अत्यन्त भयंकर, रोमांचकारी तथा सबको व्याकुल कर देनेवाला था। उसमें कोई पिता अपने पुत्रको भी पहचान नहीं पाता था॥ २३ १/२ ॥ चक्रे भग्ने युगे छिन्ने एकधुर्ये हये हतः ॥ २४ ॥ आक्षिप्तः स्यन्दनाद् वीरः ससारथिरजिह्मगैः । भीष्मके बाणोंसे पहिये टूट गये, जूआ कट गया और एकमात्र बचा हुआ रथका घोड़ा भी मारा गया। उस दशामें रथपर बैठा हुआ सारथिसहित वीर रथी भी उनके बाणोंसे आहत होकर स्वर्ग सिधारा॥ २४ १/२ ॥ एवं च समरे सर्वे वीराश्च विरथीकृताः ॥ २५ ॥ तेन तेन स्म दृश्यन्ते धावमानाः समन्ततः । इस प्रकार उस समरांगणमें रथहीन हुए सभी वीर भिन्न-भिन्न मागोंसे सब ओर दौड़ते दिखायी देते थे॥ २५ १/२ ॥ गजो हतः शिरश्छिन्नं मर्म भिन्नं हयो हतः ॥ २६ ॥ अहतः कोऽपि नैवासीद् भीष्मे निघ्नति शात्रवान् । किसीका हाथी मारा गया, किसीका मस्तक कट गया, किसीके मर्मस्थान विदीर्ण हो गये और किसीका घोड़ा ही नष्ट हो गया। जब भीष्मजी शत्रुओंका संहार कर रहे थे, उस समय (उनके सम्मुख आया हुआ) कोई भी ऐसा विपक्षी नहीं बचा, जो घायल न हुआ हो॥ २६ १/२ ॥ श्वेतः कुरूणामकरोत् क्षयं तस्मिन् महाहवे ॥ २७ ॥ राजपुत्रान् रथोदारानवधीच्छतसंघशः । इसी प्रकार उस महायुद्धमें श्वेत भी कौरवोंका संहार कर रहे थे। उन्होंने सैकड़ों श्रेष्ठ रथी राजकुमारोंका संहार कर डाला॥ २७ १/२ ॥ चिच्छेद रथिनां बाणैः शिरांसि भरतर्षभ ॥ २८ ॥ भरतश्रेष्ठ! श्वेतने अपने बाणोंद्वारा बहुत-से रथियोंके मस्तक काट डाले॥ २८ ॥ साङ्गदा बाहवश्चैव धनूंषि च समन्ततः । रथेषां रथचक्राणि तूणीराणि युगानि च ॥ २९ ॥ उन्होंने सब ओर बाण मारकर कितने ही योद्धाओंके धनुष और बाजूबंदसहित भुजाएँ काट डालीं। रथके ईषादण्ड, रथ-चक्र, तूणीर और जूए भी छिन्न-भिन्न कर दिये॥ २९ ॥ छत्राणि च महार्हाणि पताकाश्च विशाम्पते । हयौघांश्च रथौघांश्च नरौघांश्चैव भारत ॥ ३० ॥