महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1742, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंस ताड्यमानः समरे भीष्मचापच्युतैः शरैः ॥ ७९ ॥ स्वरथे धनुरुत्सृज्य शक्तिं जग्राह काञ्चनीम् । उस समरभूमिमें भीष्मजीके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा पीड़ित होनेपर श्वेतने धनुषको रथपर ही छोड़कर सुवर्णमयी शक्ति हाथमें ले ली ॥ ७९ १/२ ॥
ततः शक्तिं रणे श्वेतो जग्राहोग्रां महाभयाम् ॥ ८० ॥ कालदण्डोपमां घोरां मृत्योर्जिह्वामिव श्वसन् । अब्रवीच्च तदा श्वेतो भीष्मं शान्तनवं रणे ॥ ८१ ॥ अत्यन्त उग्र, महाभयंकर, कालदण्डके समान घोर और मृत्युकी जिह्वा-सी प्रतीत होनेवाली उस शक्तिको श्वेतने हाथमें उठाया और लंबी साँस लेते हुए रणक्षेत्रमें शान्तनुपुत्र भीष्मसे इस प्रकार कहा— ॥ ८०-८१ ॥
तिष्ठेदानीं सुसंरब्धः पश्य मां पुरुषो भव । एवमुक्त्वा महेष्वासो भीष्मं युधि पराक्रमी ॥ ८२ ॥ ततः शक्तिममेयात्मा चिक्षेप भुजगोपमाम् । पाण्डवार्थे पराक्रान्तस्तवानर्थं चिकीर्षुकः ॥ ८३ ॥ ‘भीष्म! इस समय साहसपूर्वक खड़े रहो। मुझे देखो और पुरुष बनो’, ऐसा कहकर अमित आत्मबलसे सम्पन्न महाधनुर्धर और पराक्रमी वीर श्वेतने भीष्मपर वह सर्पके समान भयंकर शक्ति चलायी। श्वेत पाण्डवोंका हित और आपके पक्षका अहित करनेकी इच्छासे पराक्रम दिखा रहे थे ॥ ८२-८३ ॥
हाहाकारो महानासीत् पुत्राणां ते विशाम्पते । दृष्ट्वा शक्तिं महाघोरां मृत्योर्दण्डसमप्रभाम् ॥ ८४ ॥ श्वेतस्य करनिर्मुक्तां निर्मुक्तोरगसंनिभाम् । राजन्! श्वेतके हाथसे छूटकर यमदण्डके समान प्रकाशित होनेवाली और केंचुल छोड़कर निकली हुई सर्पिणीकी भाँति अत्यन्त भय उत्पन्न करनेवाली उस शक्तिको देखकर आपके पुत्रोंके दलमें महान् हाहाकार मच गया ॥ ८४ १/२ ॥
अपतत् सहसा राजन् महोल्केव नभस्तलात् ॥ ८५ ॥ ज्वलन्तीमन्तरिक्षे तां ज्वालाभिरिव संवृताम् । असम्भ्रान्तस्तदा राजन् पिता देवव्रतस्तव ॥ ८६ ॥ अष्टभिर्नवभिर्भीष्मः शक्तिं चिच्छेद पत्रिभिः । राजन्! वह शक्ति आकाशसे बहुत बड़ी उल्काके समान सहसा गिरी। अन्तरिक्षमें ज्वालाओंसे घिरी हुई-सी उस प्रज्वलित शक्तिको देखकर आपके पिता देवव्रतको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने आठ-नौ बाण मारकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ ८५-८६ १/२ ॥