भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1743

उत्कृष्टहेमविकृतां निकृतां निशितैः शरैः ॥ ८७ ॥ उच्चुक्रुशुस्ततः सर्वे तावका भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उत्तम सुवर्णकी बनी हुई उस शक्तिको भीष्मके पैने बाणोंसे नष्ट हुई देख आपके पुत्र हर्षके मारे जोर-जोरसे कोलाहल करने लगे ॥ ८७ १/२ ॥ शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा वैराटिः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ८८ ॥ कालोपहतचेतास्तु कर्तव्यं नाभ्यजानत । क्रोधसम्मूर्च्छितो राजन् वैराटिः प्रहसन्निव ॥ ८९ ॥ गदां जग्राह संहृष्टो भीष्मस्य निधनं प्रति । अपनी शक्तिको इस प्रकार विफल हुई देख विराटपुत्र श्वेत क्रोधसे मूर्च्छित हो गये। कालने उनकी विवेक-शक्तिको नष्ट कर दिया था; अतः उन्हें अपने कर्तव्यका भान न रहा। उन्होंने हर्षसे उत्साहित हो हँसते-हँसते भीष्मको मार डालनेके लिये हाथमें गदा उठा ली ॥ ८८-८९ १/२ ॥ क्रोधेन रक्तनयनो दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ९० ॥ भीष्मं समभिदुद्राव जलौघ इव पर्वतम् ।