भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1758

‘हाथमें धनुष लिये इन महाबली पुरुषसिंह भीष्मको देखकर और समरभूमिमें इनके बाणोंसे आहत होकर मेरी सारी सेना भागने लगती है ।। ६ ।।

शक्यो जेतुं यमः क्रुद्धो वज्रपाणिश्च संयुगे ।
वरुणः पाशभृद् वापि कुबेरो वा गदाधरः ।। ७ ।।
न तु भीष्मो महातेजाः शक्यो जेतुं महाबलः ।
‘क्रोधमें भरे हुए यमराज, वज्रधारी इन्द्र, पाशधारी वरुण अथवा गदाधारी कुबेर भी कदाचित् युद्धमें जीते जा सकते हैं; परंतु महातेजस्वी, महाबली भीष्मको जीतना अशक्य है ।। ७ १/२ ।।

सोऽहमेवंगते मग्नो भीष्मागाधजलेऽप्लवे ।। ८ ।।
आत्मनो बुद्धिदौर्बल्याद् भीष्ममासाद्य केशव ।
‘केशव! ऐसी दशामें मैं तो अपनी बुद्धिकी दुर्बलताके कारण भीष्मसे टक्कर लेकर भीष्मरूपी अगाध जलराशिमें नावके बिना डूबा जा रहा हूँ ।। ८ १/२ ।।

वनं यास्यामि वार्ष्णेय श्रेयो मे तत्र जीवितुम् ।। ९ ।।
न त्वेतान् पृथिवीपालान् दातुं भीष्माय मृत्यवे ।
‘वार्ष्णेय! अब मैं वनको चला जाऊँगा। वहीं जीवन बिताना मेरे लिये कल्याणकारी होगा। इन भूपालोंको व्यर्थ ही भीष्मरूपी मृत्युको सौंप देनेमें कोई भलाई नहीं है ।। ९ १/२ ।।

क्षपयिष्यति सेनां मे कृष्ण भीष्मो महास्त्रवित् ।। १० ।।
यथानलं प्रज्वलितं पतङ्गाः समभिद्रुताः ।
विनाशायोपगच्छन्ति तथा मे सैनिको जनः ।। ११ ।।
‘श्रीकृष्ण! भीष्म महान् दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता हैं। वे मेरी सारी सेनाका संहार कर डालेंगे। जैसे पतिंगे मरनेके लिये ही जलती आगमें कूद पड़ते हैं, उसी प्रकार मेरे समस्त सैनिक अपने विनाशके लिये ही भीष्मके समीप जाते हैं ।। १०-११ ।।

क्षयं नीतोऽस्मि वार्ष्णेय राज्यहेतोः पराक्रमी ।
भ्रातरश्चैव मे वीराः कर्शिताः शरपीडिताः ।। १२ ।।
‘वार्ष्णेय! राज्यके लिये पराक्रम करके मैं सब प्रकारसे क्षीण होता जा रहा हूँ। मेरे वीर भ्राता बाणोंसे पीड़ित होकर अत्यन्त कृश होते जा रहे हैं ।। १२ ।।

मत्कृते भ्रातृहार्देन राज्याद् भ्रष्टास्तथा सुखात् ।
जीवितं बहु मन्येऽहं जीवितं ह्यद्य दुर्लभम् ।। १३ ।।
‘ये बन्धुजनोचित सौहार्दके कारण मेरे लिये राज्य और सुखसे वंचित हो दुःख भोग रहे हैं। इस समय मैं इनके और अपने जीवनको ही बहुत अच्छा समझता हूँ; क्योंकि अब जीवन भी दुर्लभ है ।। १३ ।।

जीवितस्य च शेषेण तपस्तप्स्यामि दुष्करम् ।
न घातयिष्यामि रणे मित्राणीमानि केशव ।। १४ ।।