महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1759, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'केशव! जीवन बच जानेपर मैं दुष्कर तपस्या करूँगा; परंतु रणक्षेत्रमें इन मित्रोंकी व्यर्थ हत्या नहीं कराऊँगा ॥ १४ ॥
रथान् मे बहुसाहस्रान् दिव्यैरस्त्रैर्महाबलः ।
घातयत्यनिशं भीष्मः प्रवराणां प्रहारिणाम् ॥ १५ ॥
'महाबली भीष्म अपने दिव्य अस्त्रोंद्वारा मेरे पक्षके श्रेष्ठ एवं प्रहारकुशल कई सहस्र रथियोंका निरन्तर संहार कर रहे हैं ॥ १५ ॥
किं नु कृत्वा हितं मे स्याद् ब्रूहि माधव माचिरम् ।
मध्यस्थमिव पश्यामि समरे सव्यसाचिनम् ॥ १६ ॥
'माधव! शीघ्र बताइये, क्या करनेसे मेरा हित होगा? सव्यसाची अर्जुनको तो मैं इस युद्धमें मध्यस्थ (उदासीन)-सा देख रहा हूँ ॥ १६ ॥
एको भीमः परं शक्त्या युध्यत्येव महाभुजः ।
केवलं बाहुवीर्येण क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ १७ ॥
'एकमात्र महाबाहु भीमसेन ही क्षत्रिय-धर्मका विचार करता हुआ केवल बाहुबलके भरोसे अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध कर रहा है ॥ १७ ॥
गदया वीरघातिन्या यथोत्साहं महामनाः ।
करोत्यसुकरं कर्म रथाश्वनरदन्तिषु ॥ १८ ॥
'महामना भीमसेन उत्साहपूर्वक अपनी वीरघातिनी गदाके द्वारा रथ, घोड़े, मनुष्य और हाथियोंपर अपना दुष्कर पराक्रम प्रकट कर रहा है ॥ १८ ॥
नालमेष क्षयं कर्तुं परसैन्यस्य मारिष ।
आर्जवेनैव युद्धेन वीर वर्षशतैरपि ॥ १९ ॥
'माननीय वीर श्रीकृष्ण! यदि इस तरह सरलतापूर्वक ही युद्ध किया जाय तो यह भीमसेन अकेला सौ वर्षोंमें भी शत्रु-सेनाका विनाश नहीं कर सकता ॥ १९ ॥
एकोऽस्त्रवित् सखा तेऽयं सोऽप्यस्मान् समुपेक्षते ।
निर्दह्यमानान् भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ॥ २० ॥
'केवल आपका यह सखा अर्जुन ही दिव्यास्त्रोंका ज्ञाता है, परंतु यह भी महामना भीष्म और द्रोणके द्वारा दग्ध होते हुए हमलोगोंकी उपेक्षा कर रहा है ॥ २० ॥
दिव्यान्यस्त्राणि भीष्मस्य द्रोणस्य च महात्मनः ।
धक्ष्यन्ति क्षत्रियान् सर्वान् प्रयुक्तानि पुनः पुनः ॥ २१ ॥
'महामना भीष्म और द्रोणके दिव्यास्त्र बार-बार प्रयुक्त होकर सम्पूर्ण क्षत्रियोंको भस्म कर डालेंगे ॥ २१ ॥
कृष्ण भीष्मः सुसंरब्धः सहितः सर्वपार्थिवैः ।
क्षपयिष्यति नो नूनं यादृशोऽस्य पराक्रमः ॥ २२ ॥