भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1760, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1760

'श्रीकृष्ण! भीष्म क्रोधमें भरकर अपने पक्षके समस्त राजाओंके साथ मिलकर निश्चय ही हमलोगोंका विनाश कर देंगे। जैसा उनका पराक्रम है, उससे यही सूचित होता है॥ २२॥

स त्वं पश्य महाभाग योगेश्वर महारथम् ।
भीष्मं यः शमयेत् संख्ये दावाग्निं जलदो यथा ॥ २३ ॥
'महाभाग योगेश्वर! आप ऐसे किसी महारथीको ढूँढ निकालिये, जो संग्रामभूमिमें भीष्मको उसी प्रकार शान्त कर दे, जैसे बादल दावानलको बुझा देता है॥ २३॥

तव प्रसादाद् गोविन्द पाण्डवा निहतद्विषः ।
स्वराज्यमनुसम्प्राप्ता मोदिष्यन्ते सबान्धवाः ॥ २४ ॥
'गोविन्द! आपकी कृपासे ही पाण्डव अपने शत्रुओंको मारकर स्वराज्य प्राप्त करके बन्धु-बान्धवोंसहित सुखी होंगे' ॥ २४॥

एवमुक्त्वा ततः पार्थो ध्यायन्नास्ते महामनाः ।
चिरमन्तर्मना भूत्वा शोकोपहतचेतनः ।
शोकार्तं तमथो ज्ञात्वा दुःखोपहतचेतसम् ॥ २५ ॥
अब्रवीत् तत्र गोविन्दो हर्षयन् सर्वपाण्डवान् ।
ऐसा कहकर महामना युधिष्ठिर शोकसे व्याकुल-चित्त हो बहुत देरतक मनको अन्तर्मुख करके ध्यानमग्न बैठे रहे। युधिष्ठिरको शोकसे आतुर और दुःखसे व्यथितचित्त जानकर गोविन्दने समस्त पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाते हुए कहा—॥ २५ १/२ ॥

मा शुचो भरतश्रेष्ठ न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥
यस्य ते भ्रातरः शूराः सर्वलोकेषु धन्विनः ।
अहं च प्रियकृद् राजन् सात्यकिश्च महायशाः ॥ २७ ॥
विराटद्रुपदौ चेमौ धृष्टद्युम्नश्च पार्षदः ।
तथैव सबलाश्चेमे राजानो राजसत्तम ॥ २८ ॥
त्वत्प्रसादं प्रतीक्षन्ते त्वद्भक्ताश्च विशाम्पते ।
'भरतश्रेष्ठ! तुम शोक न करो। इस प्रकार शोक करना तुम्हारेयोग्य नहीं है। तुम्हारे शूरवीर भाई सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात धनुर्धर हैं। राजन्! मैं भी तुम्हारा प्रिय करनेवाला ही हूँ। नृपश्रेष्ठ! महायशस्वी सात्यकि, विराट, द्रुपद, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न तथा सेनासहित ये सम्पूर्ण नरेश आपके कृपाप्रसादकी प्रतीक्षा करते हैं। महाराज! ये सब-के-सब आपके भक्त हैं॥ २६—२८ १/२ ॥

एष ते पार्षदो नित्यं हितकामः प्रिये रतः ॥ २९ ॥
सैनापत्यमनुप्राप्तो धृष्टद्युम्नो महाबलः ।
'ये द्रुपदपुत्र महाबली धृष्टद्युम्न भी सदा आपका हित चाहते हैं और आपके प्रिय-साधनमें तत्पर होकर ही इन्होंने प्रधान सेनापतिका गुरुतर भार ग्रहण किया है॥ २९ १/२ ॥