भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1761

शिखण्डी च महाबाहो भीष्मस्य निधनं किल ।। ३० ।।
(करिष्यति न संदेहो नृपाणां युधि पश्यताम् ।)
‘महाबाहो! निश्चय ही इन समस्त राजाओंके देखते-देखते यह शिखण्डी भीष्मका वध कर डालेगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है’ ।। ३० ।।
एतच्छ्रुत्वा ततो राजा धृष्टद्युम्नं महारथम् ।
अब्रवीत् समितौ तस्यां वासुदेवस्य शृण्वतः ।। ३१ ।।
यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके सुनते ही उस सभामें महारथी धृष्टद्युम्नसे कहा— ।। ३१ ।।
धृष्टद्युम्न निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि मारिष ।
नातिक्रम्यं भवेत् तच्च वचनं मम भाषितम् ।। ३२ ।।
‘आदरणीय वीर धृष्टद्युम्न! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, इसे ध्यान देकर सुनो। मेरे कहे हुए वचनोंका तुम्हें उल्लंघन नहीं करना चाहिये ।। ३२ ।।
भवान् सेनापतिर्मह्यं वासुदेवेन सम्मितः ।
कार्तिकेयो यथा नित्यं देवानामभवत् पुरा ।। ३३ ।।
तथा त्वमपि पाण्डूनां सेनानीः पुरुषर्षभ ।
‘तुम मेरे सेनापति हो, भगवान् श्रीकृष्णके समान पराक्रमी हो। पुरुषरत्न! पूर्वकालमें भगवान् कार्तिकेय जिस प्रकार देवताओंके सेनापति हुए थे, उसी प्रकार तुम भी पाण्डवोंके सेनानायक होओ’ ।। ३३ १/२ ।।
(तच्छ्रुत्वा जहृषुः पार्थाः पार्थिवाश्च महारथाः ।
साधु साध्विति तद्वाक्यमूचुः सर्वे महीक्षितः ।।
पुनरप्यब्रवीद् राजा धृष्टद्युम्नं महाबलम् ।।)
युधिष्ठिरका यह कथन सुनकर समस्त पाण्डव और महारथी भूपालगण सब-के-सब ‘साधु-साधु’ कहकर उनके इन वचनोंकी सराहना करने लगे। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने पुनः महाबली धृष्टद्युम्नसे कहा—।
स त्वं पुरुषशार्दूल विक्रम्य जहि कौरवान् ।। ३४ ।।
अहं च तेऽनुयास्यामि भीमः कृष्णश्च मारिष ।
माद्रीपुत्रौ च सहितौ द्रौपदेयाश्च दंशिताः ।। ३५ ।।
ये चान्ये पृथिवीपालाः प्रधानाः पुरुषर्षभ ।
‘पुरुषसिंह! तुम पराक्रम करके कौरवोंका नाश करो। मारिष! नरश्रेष्ठ! मैं, भीमसेन, श्रीकृष्ण, माद्रीकुमार नकुल-सहदेव, द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा अन्य प्रधान-प्रधान भूपाल कवच धारण करके तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे’ ।। ३४-३५ १/२ ।।
तत उद्धर्षयन् सर्वान् धृष्टद्युम्नोऽभ्यभाषत ।। ३६ ।।
अहं द्रोणान्तकः पार्थ विहितः शम्भुना पुरा ।