महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1763, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंआकाशग इवाकाशे गन्धर्वनगरोपमः ॥ ४४ ॥ इन्द्रधनुषके रंगकी पताकाएँ उस ध्वजकी शोभा बढ़ाती थीं। वह ध्वज आकाशमें आकाशचारी पक्षीकी भाँति बिना आधारके ही चलता था। वह दूरसे गन्धर्वनगरके समान जान पड़ता था ॥ ४४ ॥
नृत्यमान इवाभाति रथचर्यासु मारिष । तेन रत्नवता पार्थः स च गाण्डीवधन्वना ॥ ४५ ॥ बभूव परमोपेतः सुमेरुरिव भानुना । आर्य! रथके मार्गोंपर अर्जुनका वह ध्वज नृत्य करता-सा प्रतीत होता था। उस रत्नयुक्त ध्वजसे अर्जुनकी और गाण्डीवधारी अर्जुनसे उस ध्वजकी बड़ी शोभा होती थी, ठीक उसी तरह जैसे मेरु पर्वतसे सूर्यकी और सूर्यसे मेरु पर्वतकी शोभा होती है ॥ ४५ १/२ ॥
शिरोऽभूद् द्रुपदो राजन् महत्या सेनया वृतः ॥ ४६ ॥ कुन्तिभोजश्च चैद्यश्च चक्षुर्भ्यां तौ जनेश्वरौ । दाशार्णकाः प्रभद्राश्च दाशेरकगणैः सह ॥ ४७ ॥ अनूपकाः किराताश्च ग्रीवायां भरतर्षभ । राजन्! अपनी विशाल सेनाके साथ राजा द्रुपद उस व्यूहके सिरके स्थानपर थे। कुन्तिभोज और धृष्टकेतु—ये दोनों नरेश नेत्रोंके स्थानपर प्रतिष्ठित हुए। भरतश्रेष्ठ! दाशार्णक, दाशेरकसमूहोंके साथ प्रभद्रक, अनूपक और किरातगण गर्दनके स्थानमें खड़े किये गये ॥ ४६-४७ १/२ ॥
पटच्चरैश्च पौण्ड्रैश्च राजन् पौरवकैस्तथा ॥ ४८ ॥ निषादैः सहितश्चापि पृष्ठमासीद् युधिष्ठिरः । पक्षौ तु भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ४९ ॥ द्रौपदेयाभिमन्युश्च सात्यकिश्च महारथः । पिशाचा दारदाश्चैव पुण्ड्राः कुण्डीविषैः सह ॥ ५० ॥ मारुता धेनुकाश्चैव तङ्गणाः परतङ्गणाः । बाह्लिकास्तित्तिराश्चैव चोलाः पाण्ड्याश्च भारत ॥ ५१ ॥ एते जनपदा राजन् दक्षिणं पक्षमाश्रिताः । पटच्चर, पौण्ड्र, पौरव तथा निषादोंके साथ स्वयं राजा युधिष्ठिर पृष्ठभागमें स्थित हुए। भीमसेन और धृष्टद्युम्न क्रौंचपक्षीके दोनों पंखोंके स्थानपर नियुक्त किये गये। राजन्! द्रौपदीके पुत्र, अभिमन्यु और महारथी सात्यकिके साथ पिशाच, दारद, पुण्ड्र, कुण्डीविष, मारुत, धेनुक, तंगण, परतंगण, बाह्लिक, तित्तिर, चोल तथा पाण्ड्य—इन जनपदोंके लोग दाहिने पंखका आश्रय लेकर खड़े हुए ॥ ४८—५१ १/२ ॥
अग्निवेश्यास्तु हुण्डाश्च मालवा दानभारयः ॥ ५२ ॥