महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1764, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंशबरा उद्द्वासैश्चैव वत्साश्च सह नाकुलैः ।
नकुलः सहदेवश्च वामं पक्षं समाश्रिताः ॥ ५३ ॥
अग्निवेश्य, हुण्ड, मालव, दानभारि, शबर, उद्द्वास, वत्स तथा नाकुल जनपदोंके साथ दोनों भाई नकुल और सहदेवने बायें पंखका आश्रय लिया ॥ ५२-५३ ॥
रथानामयुतं पक्षौ शिरस्तु नियुतं तथा ।
पृष्ठमर्बुदमेवासीत् सहस्राणि च विंशतिः ॥ ५४ ॥
ग्रीवायां नियुतं चापि सहस्राणि च सप्ततिः ।
उस क्रौंचपक्षीके पंखभागमें दस हजार, शिरोभागमें एक³ लाख, पृष्ठभागमें एक अर्बुद³ बीस हजार तथा ग्रीवाभागमें एक लाख सत्तर हजार रथ मौजूद थे ॥ ५४ १/२ ॥
पक्षकोटिप्रपक्षेषु पक्षान्तेषु च वारणाः ॥ ५५ ॥
जग्मुः परिवृता राजंश्चलन्त इव पर्वताः ।
राजन्! पक्ष³, कोटि⁴, प्रपक्ष⁵ तथा पक्षान्त-भागोंमें चलते-फिरते पर्वतोंके समान हाथियोंके झुंड चले। वे सब-के-सब सेनाओंसे घिरे हुए थे ॥ ५५ १/२ ॥
जघनं पालयामास विराटः सह केकयैः ॥ ५६ ॥
काशिराजश्च शैब्यश्च रथानामयुतैस्त्रिभिः ।
राजा विराट केकयराजकुमारोंके साथ उस व्यूहके जघन (कटिके अग्रभाग)-की रक्षा करते थे। काशिराज और शैब्य भी तीस हजार रथियोंके साथ उसीकी रक्षामें तत्पर थे ॥ ५६ १/२ ॥
एवमेनं महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः ॥ ५७ ॥
सूर्योदयं त इच्छन्तः स्थिता युद्धाय दंशिताः ।
भारत! इस प्रकार पाण्डव क्रौंचारुण नामक महाव्यूहकी रचना करके सूर्योदयकी प्रतीक्षा करते हुए युद्धके लिये कवच आदिसे सुसज्जित हो खड़े हो गये ॥ ५७ १/२ ॥
तेषामादित्यवर्णानि विमलानि महान्ति च ।
श्वेतच्छत्राण्यशोभन्त वारणेषु रथेषु च ॥ ५८ ॥
उनके हाथियों और रथोंके ऊपर सूर्यके समान प्रकाशमान, निर्मल एवं महान् श्वेतच्छत्र शोभा पा रहे थे ॥ ५८ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि क्रौञ्चव्यूहनिर्माणे
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें क्रौंचव्यूहनिर्माणविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ६० १/२ श्लोक हैं।]