महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1777, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीष्मोऽपि समरे पार्थं विव्याध निशितैः शरैः । अर्जुनने पचीस तीखे बाणोंसे मारकर भीष्मको पीड़ित कर दिया। फिर भीष्मने भी समरभूमिमें अपने तीक्ष्ण सायकोंद्वारा अर्जुनको बींध दिया ॥ ४८ ½ ॥ अन्योन्यस्य हयान् विद्ध्वा ध्वजौ च सुमहाबलौ ॥ ४९ ॥ रथेषां रथचक्रे च चिक्रीडतुररिंदमौ । वे दोनों शत्रुओंका दमन करनेवाले तथा अत्यन्त बलवान् थे। अतः एक-दूसरेके घोड़ों, ध्वजाओं, रथके ईषादण्ड तथा पहियोंको बाणोंसे बींधकर खेल-सा करने लगे ॥ ४९ ½ ॥ ततः क्रुद्धो महाराज भीष्मः प्रहरतां वरः ॥ ५० ॥ वासुदेवं त्रिभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे । महाराज! तदनन्तर प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ भीष्मने कुपित होकर तीन बाणोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५० ½ ॥ भीष्मचापच्युतैस्तैस्तु निर्विद्धो मधुसूदनः ॥ ५१ ॥ विराज रणे राजन् सपुष्प इव किंशुकः । राजन्! भीष्मजीके धनुषसे छूटे हुए उन बाणोंसे विद्ध होकर भगवान् मधुसूदन रणभूमिमें रक्तरंजित हो खिले हुए पलाशके वृक्षके समान शोभा पाने लगे ॥ ५१ ½ ॥ ततोऽर्जुनो भृशं क्रुद्धो निविद्धं प्रेक्ष्य माधवम् ॥ ५२ ॥ सारथिं कुरुवृद्धस्य निर्बिभेद शितैः शरैः । श्रीकृष्णको घायल हुआ देख अर्जुन अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने तीखे सायकोंद्वारा कुरुकुलवृद्ध भीष्मके सारथिको विदीर्ण कर डाला ॥ ५२ ½ ॥ यतमानौ तु तौ वीरावन्योन्यस्य वधं प्रति ॥ ५३ ॥ न शक्नुतां तदान्योन्यमभिसंधातुमाहवे । इस प्रकार वे दोनों वीर एक-दूसरेके वधके लिये पूरा प्रयत्न कर रहे थे; तथापि वे युद्धभूमिमें परस्पर अभिसंधान (घातक प्रहार) करनेमें सफल न हो सके ॥ ५३ ½ ॥ तौ मण्डलानि चित्राणि गतप्रत्यागतानि च ॥ ५४ ॥ अदर्शयेतां बहुधा सूतसामर्थ्यलाघवात् । वे दोनों अपने सारथिकी शक्ति तथा शीघ्रकारिताके कारण नाना प्रकारके विचित्र मण्डल, आगे बढ़ने और पीछे हटने आदिके पैंतरे दिखाने लगे ॥ ५४ ½ ॥ अन्तरं च प्रहारेषु तर्कयन्तौ परस्परम् ॥ ५५ ॥ राजन्नन्तरमार्गस्थौ स्थितावास्तां मुहुर्मुहुः । राजन्! दोनों ही एक-दूसरेके प्रहारोंमें छिद्र ढूँढ़नेके लिये सतर्क थे। वे बारंबार छिद्रान्वेषणके मार्गमें स्थित हो छिद्र देखनेमें संलग्न रहते थे ॥ ५५ ½ ॥ उभौ सिंहखवोन्मिश्रं शङ्खशब्दं च चक्रतुः ॥ ५६ ॥ तथैव चापनिर्घोषं चक्रतुस्तौ महारथौ ।