महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1778, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे दोनों महारथी सिंहनादसे मिला हुआ शंखनाद करते और धनुषकी टंकार फैलाते रहते थे ॥ ५६ १/२ ॥ तयोः शङ्खनिनादेन रथनेमिस्वनेन च ॥ ५७ ॥ दारिता सहसा भूमिश्चकम्पे च ननाद च । उनकी शंखध्वनि तथा रथके पहियोंकी घरघराहटसे पृथ्वी सहसा विदीर्ण-सी होकर काँपने और आर्तनाद करने लगी ॥ ५७ १/२ ॥ नोभयोरन्तरं कश्चिद् ददृशे भरतर्षभ ॥ ५८ ॥ बलिनौ युद्धदुर्धर्षावन्योन्यसदृशावुभौ । भरतश्रेष्ठ! वे दोनों वीर बलवान्, युद्धमें दुर्जय तथा एक-दूसरेके अनुरूप थे। अतः ढूँढ़नेपर भी कोई उनमेंसे किसीका अन्तर न देख सका ॥ ५८ १/२ ॥ चिह्नमात्रेण भीष्मं तु प्रजज्ञुस्तत्र कौरवाः ॥ ५९ ॥ तथा पाण्डुसुताः पार्थं चिह्नमात्रेण जज्ञिरे । उस समय कौरवोंने भीष्मको तालध्वज आदि चिह्नमात्रसे ही पहचाना। इसी प्रकार पाण्डुपुत्रोंने भी कपिध्वज आदि चिह्नमात्रसे ही पार्थकी पहचान की ॥ ५९ १/२ ॥ तयोर्नृवरयोर्दृष्ट्वा तादृशं तं पराक्रमम् ॥ ६० ॥ विस्मयं सर्वभूतानि जग्मुर्भारत संयुगे । भारत! उस संग्राममें उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंके वैसे पराक्रमको देखकर सम्पूर्ण प्राणी बड़े विस्मयमें पड़ गये ॥ ६० १/२ ॥ न तयोर्विवरं कश्चिद् रणे पश्यति भारत ॥ ६१ ॥ धर्मे स्थितस्य हि यथा न कश्चिद् वृजिनं क्वचित् । भरतनन्दन! जैसे कोई धर्मनिष्ठ पुरुषमें कहीं कोई पाप नहीं देख पाता, उसी प्रकार कोई भी रणक्षेत्रमें उन दोनों योद्धाओंका छिद्र नहीं देख पाता था ॥ ६१ १/२ ॥ उभौ च शरजालेन तावदृश्यौ बभूवतुः ॥ ६२ ॥ प्रकाशौ च पुनस्तूर्णं बभूवतुरुभौ रणे । दोनों ही संग्रामभूमिमें एक-दूसरेके बाणसमूहोंसे आच्छादित होकर अदृश्य हो जाते और उन्हें छिन्न-भिन्न करके शीघ्र ही प्रकाशमें आ जाते थे ॥ ६२ १/२ ॥ तत्र देवाः सगन्धर्वाश्चारणाश्चर्षिभिः सह ॥ ६३ ॥ अन्योन्यं प्रत्यभाषन्त तयोर्दृष्ट्वा पराक्रमम् । न शक्यौ युधि संरब्धौ जेतुमेतौ कथञ्चन ॥ ६४ ॥ सदेवासुरगन्धर्वैर्लोकैरपि महारथौ ।