भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1793, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1793

स चचार बहून् मार्गानभितः पातयन् गजान् । अग्निचक्रमिवाविद्धं सर्वतः प्रत्यदृश्यत ॥ ४३ ॥ फिर दोनों ओर घूम-घूमकर हाथियोंको गिराते हुए वे अनेक मार्गोंसे विचरण करने लगे। उस समय घूमते हुए अलातचक्रकी भाँति वे सब ओर दिखायी देते थे ॥ ४३ ॥

अश्ववृन्देषु नागेषु रथानीकेषु चाभिभूः । पदातीनां च संघेषु विनिघ्नन् शोणितोक्षितः ॥ ४४ ॥ शक्तिशाली भीमसेन घोड़ों, हाथियों, रथों और पैदलोंके समूहोंमें घुसकर सबका संहार करते हुए रक्तसे भीग गये ॥ ४४ ॥

श्येनवद् व्यचरद् भीमो रणेऽरिषु बलोत्कटः । छिन्दंस्तेषां शरीराणि शिरांसि च महाबलः ॥ ४५ ॥ प्रचण्डबलवाले महान् शक्तिशाली भीमसेन शत्रुओंके समूहमें घुसकर उनके शरीर और मस्तक काटते हुए बाज पक्षीकी तरह रणभूमिमें विचरने लगे ॥ ४५ ॥

खड्गेन शितधारेण संयुगे गजयोधिनाम् । पदातिरेकः संक्रुद्धः शत्रूणां भयवर्धनः ॥ ४६ ॥ सम्मोहयामास स तान् कालान्तकयमोपमः । उस रण-क्षेत्रमें गजारूढ़ होकर युद्ध करनेवाले योद्धाओंके मस्तकोंको अपनी तीखी धारवाली तलवारसे काटते हुए वे अकेले ही क्रोधमें भरकर पैदल विचरते और शत्रुओंके भयको बढ़ाते थे। उन्होंने प्रलयकालीन यमराजके समान भयंकर रूप धारण करके उन सबको भयसे मोहित कर दिया था ॥ ४६ १/२ ॥

मूढाश्च ते तमेवाजौ विनदन्तः समाद्रवन् ॥ ४७ ॥ सासिमुत्तमवेगेन विचरन्तं महारणे । वे मूढ़ सैनिक गर्जना करते हुए उन्हींके पास दौड़े चले आते (और मारे जाते) थे। भीमसेन हाथमें तलवार लिये उस महान् संग्राममें बड़े वेगसे विचरण करते थे ॥ ४७ १/२ ॥

निकृत्य रथिनां चाजौ रथेषांश्च युगानि च ॥ ४८ ॥ जघान रथिनश्चापि बलवान् रिपुमर्दनः । शत्रुओंका मर्दन करनेवाले बलवान् भीम युद्धमें रसारोहियोंके रथोंके ईषादण्ड और जूए काटकर उन रथियोंका भी संहार कर डालते थे ॥ ४८ १/२ ॥

भीमसेनश्चरन् मार्गान् सुबहून् प्रत्यदृश्यत ॥ ४९ ॥ भ्रान्तमाविद्धमुद्भ्रान्तमाप्लुतं प्रसृतं प्लुतम् । सम्पातं समुदीर्णं च दर्शयामास पाण्डवः ॥ ५० ॥ उस समय पाण्डुनन्दन भीमसेन अनेक मागोंपर विचरते हुए दिखायी देते थे। उन्होंने खड्गयुद्धके भ्रान्त, आविद्ध, उद्भ्रान्त, आप्लुत, प्रसृत, प्लुत, सम्पात तथा समुदीर्ण आदि

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