भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1794

बहुत-से पैंतरे दिखाये*॥ ४९-५० ॥ केचिदग्रासिना छिन्नाः पाण्डवेन महात्मना ।
विनेदुर्भिन्नमर्माणो निपेतुश्च गतासवः ॥ ५१ ॥
पाण्डुनन्दन महामना भीमसेनके श्रेष्ठ खड्गकी चोटसे कितने ही हाथियोंके अंग छिन्न-भिन्न हो उनके मर्मस्थल विदीर्ण हो गये और वे चिग्घाड़ते हुए प्राणशून्य होकर धरतीपर गिर पड़े॥ ५१ ॥
छिन्नदन्ताग्रहस्ताश्च भिन्नकुम्भास्तथा परे ।
वियोधाः स्वान्यनीकानि जघ्नुर्भारत वारणाः ॥ ५२ ॥
निपेतुरुर्व्यां च तथा विनदन्तो महारवान् ।
भरतनन्दन! कुछ गजराजोंके दाँत और सूँड़के अग्रभाग कट गये, कुम्भस्थल फट गये और सवार मारे गये। उस अवस्थामें उन्होंने इधर-उधर भागकर अपनी ही सेनाओंको कुचल डाला और अन्तमें जोर-जोरसे चिग्घाड़ते हुए वे पृथ्वीपर गिरे और मर गये ॥ ५२ १/२ ॥
छिन्नांश्च तोमरान् राजन् महामात्रशिरांसि च ॥ ५३ ॥
परिस्तोमान् विचित्रांश्च कक्ष्याश्च कनकोज्ज्वलाः ।
ग्रैवेयाण्यथ शक्तीश्च पताकाः कणपांस्तथा ॥ ५४ ॥
तूणीरानथ यन्त्राणि विचित्राणि धनूंषि च ।
भिन्दिपालानि शुभ्राणि तोत्राणि चाङ्कुशैः सह ॥ ५५ ॥
घण्टाश्च विविधा राजन् हेमगर्भान् त्सरूनपि ।
पततः पातितांश्चैव पश्यामः सह सादिभिः ॥ ५६ ॥
राजन्! हमलोगोंने वहाँ देखा, बहुत-से तोमर और महावतोंके मस्तक कटकर गिरे हैं, हाथियोंकी पीठोंपर बिछी हुई विचित्र-विचित्र झूलें पड़ी हुई हैं। हाथियोंको कसनेके उपयोगमें आनेवाली स्वर्णभूषित चमकीली रस्सियाँ गिरी हुई हैं, हाथी और घोड़ोंके गलेके आभूषण, शक्ति, पताका, कणप (अस्त्रविशेष), तरकस, विचित्र यन्त्र, धनुष, चमकीले भिन्दिपाल, तोत्र, अंकुश, भाँति-भाँतिके घंटे तथा स्वर्णजटित खड्गमुष्टि—ये सब वस्तुएँ हाथीसवारों-सहित गिरी हुई हैं और गिरती जा रही हैं॥
छिन्नगात्रावरकरैर्निहतैश्चापि वारणैः ।
आसीद् भूमिः समास्तीर्णा पतितैर्भूधरैरिव ॥ ५७ ॥
कहीं कटे हुए हाथियोंके शरीरके ऊर्ध्वभाग पड़े थे, कहीं अधोभाग पड़े थे। कहीं कटी हुई सूँडें पड़ी थीं और कहीं मारे गये हाथियोंकी लोथें पड़ी थीं। उनसे आच्छादित हुई वह समरभूमि ढहे हुए पर्वतोंसे ढकी-सी जान पड़ती थी॥ ५७॥
विमृद्यैवं महानागान् ममर्दान्यान् महाबलः ।
अश्वारोहवरांश्चैव पातयामास संयुगे ॥ ५८ ॥
तद् घोरमभवद् युद्धं तस्य तेषां च भारत ।