महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1798, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंविप्रजग्मुरनीकेषु मेघा वातहता इव ।
मृद्नन्तः स्वान्यनीकानि विनदन्तः शरातुराः ॥ ८४ ॥
उस रणभूमिमें पाण्डुनन्दन भीमके द्वारा सवारोंके मार दिये जानेपर बहुत-से मतवाले हाथी वायुके थपेड़े खाये हुए बादलोंके समान कौरव-सेनामें इधर-उधर भागने तथा अपने ही सैनिकोंको कुचलते हुए बाणोंकी व्यथासे व्याकुल हो चीत्कार करने लगे ॥ ८३-८४ ॥
ततो भीमो महाबाहुः खड्गहस्तो महाभुजः ।
सम्प्रहृष्टो महाघोषं शङ्खं प्राध्मापयद् बली ॥ ८५ ॥
तदनन्तर महाबली महाबाहु भीमसेनने खड्ग हाथमें लिये हुए अत्यन्त प्रसन्न हो बड़े जोरसे शंख बजाया ॥ ८५ ॥
सर्वकालिङ्गसैन्यानां मनांसि समकम्पयत् ।
मोहश्चापि कलिङ्गानामाविवेश परंतप ॥ ८६ ॥
परंतप! उस शंखनादके द्वारा उन्होंने सम्पूर्ण कलिंगोंके हृदयमें कम्प मचा दिया और उन सबपर बड़ा भारी मोह छा गया ॥ ८६ ॥
प्राकम्पन्त च सैन्यानि वाहनानि च सर्वशः ।
भीमेन समरे राजन् गजेन्द्रेणेव सर्वशः ॥ ८७ ॥
मार्गान् बहून् विचरता धावता च ततस्ततः ।
मुहुरुत्पतता चैव सम्मोहः समजायत ॥ ८८ ॥
राजन्! उस समरांगणमें गजराजके समान अनेक मार्गोंपर विचरते और इधर-उधर दौड़ते हुए भीमसेनके भयसे समस्त सैनिक और वाहन थर-थर काँपने लगे। उनके बार-बार उछलनेसे सबपर मोह छा गया ॥ ८७-८८ ॥
भीमसेनभयत्रस्तं सैन्यं च समकम्पत ।
क्षोभ्यमाणमसम्बाधं ग्राहेणेव महत् सरः ॥ ८९ ॥
जैसे महान् तालाब किसी ग्राहके द्वारा मथित होनेपर क्षुब्ध हो उठता है, उसी प्रकार वह सारी सेना भीमसेनके द्वारा बेरोक-टोक मथित होनेपर भयसे संत्रस्त हो काँपने लगी ॥ ८९ ॥
त्रासितेषु च सर्वेषु भीमेनाद्भुतकर्मणा ।
पुनरावर्तमानेषु विद्रवत्सु च सङ्घशः ॥ ९० ॥
सर्वकालिङ्गयोधेषु पाण्डूनां ध्वजिनीपतिः ।
अब्रवीत् स्वान्यनीकानि युध्यध्वमिति पार्षतः ॥ ९१ ॥
अद्भुतकर्मा भीमसेनके द्वारा भयभीत कर दिये जानेपर कलिंग देशके समस्त योद्धा जब दल बनाकर भागने और भाग-भागकर पुनः लौटने लगे, तब पाण्डव-सेनापति द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने अपने समस्त सैनिकोंसे कहा—'वीरो! (उत्साहके साथ) युद्ध करो' ॥ ९०-९१ ॥