महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1799, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसेनापतिवचः श्रुत्वा शिखण्डिप्रमुखा गणाः । भीममेवाभ्यवर्तन्त रथानीकैः प्रहारिभिः ॥ ९२ ॥ सेनापतिकी बात सुनकर शिखण्डी आदि महारथी प्रहारकुशल रथियोंकी सेनाओंके साथ भीमसेनका ही अनुसरण करने लगे ॥ ९२ ॥
धर्मराजश्च तान् सर्वानुपजग्राह पाण्डवः । महता मेघवर्णेन नागानीकेन पृष्ठतः ॥ ९३ ॥ तत्पश्चात् पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर मेघोंकी घटाके समान हाथियोंकी विशाल सेना साथ लिये पीछेसे आकर उन सबकी सहायता करने लगे ॥ ९३ ॥
एवं संनोद्य सर्वाणि स्वान्यनीकानि पार्षतः । भीमसेनस्य जग्राह पाष्णिं सत्पुरुषैर्वृतः ॥ ९४ ॥ इस प्रकार द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नने अपनी सारी सेनाओंको युद्धके लिये प्रेरित करके श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ भीमसेनके पृष्ठभागकी रक्षाका कार्य हाथमें लिया ॥ ९४ ॥
न हि पञ्चालराजस्य लोके कश्चन विद्यते । भीमसात्यकयोरन्यः प्राणेभ्यः प्रियकृत्तमः ॥ ९५ ॥ जगत्में पांचालराज धृष्टद्युम्नके लिये भीम और सात्यकिको छोड़कर दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं था, जो प्राणोंसे भी बढ़कर हो ॥ ९५ ॥
सोऽपश्यच्च कलिङ्गेषु चरन्तमरिसूदनः । भीमसेनं महाबाहुं पार्षतः परवीरहा ॥ ९६ ॥ शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले वैरिविनाशक द्रुपद-कुमार धृष्टद्युम्नने महाबाहु भीमसेनको कलिंगोंकी सेनामें विचरते देखा ॥ ९६ ॥
ननर्द बहुधा राजन् हृष्टश्चासीत् परंतपः । शङ्खं दध्मौ च समरे सिंहनादं ननाद च ॥ ९७ ॥ राजन्! उन्हें देखते ही परंतप धृष्टद्युम्नके हृदयमें हर्षकी सीमा न रही। वे बारंबार गर्जना करने लगे। उन्होंने समरांगणमें शंख बजाया और सिंहनाद किया ॥ ९७ ॥
स च पारावताश्वस्य रथे हेमपरिष्कृते । कोविदारध्वजं दृष्ट्वा भीमसेनः समाश्वसत् ॥ ९८ ॥ कबूतरके समान रंगवाले घोड़े जिनके रथमें जोते जाते हैं, उन धृष्टद्युम्नके सुवर्णभूषित रथमें कचनार वृक्षके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती देख भीमसेनको बड़ा आश्वासन मिला ॥ ९८ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु तं दृष्ट्वा कलिङ्गैः समभिद्रुतम् । भीमसेनममेयात्मा त्राणायाजौ समभ्ययात् ॥ ९९ ॥ कलिंगोंने भीमसेनपर धावा किया है, यह देखकर अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न धृष्टद्युम्न भीमसेनकी रक्षाके लिये युद्धस्थलमें उनके पास जा पहुँचे ॥ ९९ ॥