महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1828, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय वहाँ धनुषोंकी टंकार तथा हथेलियोंके आघातसे पर्वतोंके विदीर्ण होनेके समान बड़े जोरसे शब्द होता था ॥ ७ ॥ तिष्ठ स्थितोऽस्मि विद्ध्येनं निवर्तस्व स्थिरो भव । स्थिरोऽस्मि प्रहरस्वेति शब्दोऽश्रूयत सर्वशः ॥ ८ ॥ उस समय 'खड़े रहो, खड़ा हूँ, इसे बींध डालो, लौटो, स्थिर भावसे रहो, हाँ-हाँ स्थिरभावसे ही हूँ, तुम प्रहार करो' ऐसे शब्द सब ओर सुनायी पड़ते थे ॥ ८ ॥ काञ्चनेषु तनुत्रेषु किरीटेषु ध्वजेषु च । शिलानामिव शैलेषु पतितानामभूद् ध्वनिः ॥ ९ ॥ जब सोनेके कवचों, किरीटों और ध्वजोंपर योद्धाओं-के अस्त्र-शस्त्र टकराते, तब उनसे पर्वतोंपर गिरकर टकरानेवाली शिलाओंके समान भयानक शब्द होता था ॥ ९ ॥ पतितान्युत्तमाङ्गानि बाहवश्च विभूषिताः । व्यचेष्टन्त महीं प्राप्य शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १० ॥ सैनिकोंके सैकड़ों-हजारों मस्तक तथा स्वर्ण-भूषित भुजाएँ कट-कटकर पृथ्वीपर गिरने और तड़पने लगीं ॥ १० ॥ हृतोत्तमाङ्गाः केचित् तु तथैवोद्यतकार्मुकाः । प्रगृहीतायुधाश्चापि तस्थुः पुरुषसत्तमाः ॥ ११ ॥ कितने ही पुरुषशिरोमणि वीरोंके मस्तक तो कट गये, परंतु उनके धड़ पूर्ववत् धनुष-बाण एवं अन्य आयुध लिये खड़े ही रह गये ॥ ११ ॥ प्रावर्तत महावेगा नदी रुधिरवाहिनी । मातङ्गाङ्गशिला रौद्रा मांसशोणितकर्दमा ॥ १२ ॥ वराश्वनरनागानां शरीरप्रभवा तदा । परलोकार्णवमुखी गृध्रगोमायुमोदिनी ॥ १३ ॥ रणक्षेत्रमें बड़े वेगसे रक्तकी नदी बह चली, जो देखनेमें बड़ी भयानक थी। हाथियोंके शरीर उसके भीतर शिलाखण्डोंके समान जान पड़ते थे। खून और मांस कीचड़के समान प्रतीत होते थे। बड़े-बड़े हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंसे ही वह नदी निकली थी और परलोकरूपी समुद्रकी ओर प्रवाहित हो रही थी। वह रक्त-मांसकी नदी गीधों और गीदड़ोंको आनन्द प्रदान करनेवाली थी ॥ १२-१३ ॥ न दृष्टं न श्रुतं वापि युद्धमेतादृशं नृप । यथा तव सुतानां च पाण्डवानां च भारत ॥ १४ ॥ भारत! नरेश्वर! पाण्डवों और आपके पुत्रोंका उस दिन जैसा भयानक युद्ध हुआ, वैसा न कभी देखा गया है और न सुना ही गया है ॥ १४ ॥ नासीद् रथपथस्तत्र योधैर्युधि निपातितैः । गजैश्च पतितैर्नीलैर्गिरिशृङ्गैरिवावृतः ॥ १५ ॥