महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1827, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनषष्टितमोऽध्यायः
भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति
धृतराष्ट्र उवाच
प्रतिज्ञाते ततस्तस्मिन् युद्धे भीष्मेण दारुणे ।
क्रोधितो मम पुत्रेण दुःखितेन विशेषतः ॥ १ ॥
भीष्मः किमकरोत् तत्र पाण्डवेयेषु संयुगे ।
पितामहे वा पञ्चालास्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा— संजय! उस भयंकर युद्धमें जब भीष्मने मेरे विशेष दुःखी हुए पुत्रके क्रोध दिलानेपर प्रतिज्ञा कर ली, तब उन्होंने उस युद्धस्थलमें पाण्डवोंके प्रति क्या किया? तथा पांचाल योद्धाओंने पितामह भीष्मके प्रति क्या किया? ॥ १-२ ॥
संजय उवाच
गतपूर्वाह्नभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि भारत ।
पश्चिमां दिशमास्थाय स्थिते चापि दिवाकरे ॥ ३ ॥
जयं प्राप्तेषु हृष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
सर्वधर्मविशेषज्ञः पिता देवव्रतस्तव ॥ ४ ॥
अभ्ययाज्जवनैरश्वैः पाण्डवानामनीकिनीम् ।
महत्या सेनया गुप्तस्तव पुत्रैश्च सर्वशः ॥ ५ ॥
संजयने कहा— भारत! उस दिन जब पूर्वाह्नकालका अधिक भाग व्यतीत हो गया, सूर्यदेव पश्चिम दिशामें जाकर स्थित हुए और विजयको प्राप्त हुए महामना पाण्डव खुशी मनाने लगे, उस समय सब धर्मोंके विशेषज्ञ आपके ताऊ भीष्मजीने वेगशाली अश्वोंद्वारा पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण किया। उनके साथ विशाल सेना चली और आपके पुत्र सब ओरसे उनकी रक्षा करने लगे ॥ ३—५ ॥
प्रावर्तत ततो युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
अस्माकं पाण्डवैः सार्धमनयात् तव भारत ॥ ६ ॥
भारत! तदनन्तर आपके अन्यायसे हमलोगोंका पाण्डवोंके साथ रोमांचकारी भयंकर संग्राम होने लगा ॥ ६ ॥
धनुषां कूजतां तत्र तलानां चाभिहन्यताम् ।
महान् समभवच्छब्दो गिरीणामिव दीर्यताम् ॥ ७ ॥