भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 183

स तं राजा धृतराष्ट्रः कुरुभ्यो

न सस्मार विदुरं पुत्रकाम्यात् ॥ १३ ॥

बुद्धिमान्, कौरवोंके अभीष्टकी सिद्धि चाहनेवाले, बहुश्रुत विद्वान्, उत्तम वक्ता तथा

शीलवान् विदुरजीका भी राजा धृतराष्ट्रने कौरवोंके हितके लिये पुत्रस्नेहकी लालसासे आदर

नहीं किया ॥ १३ ॥

मानघ्नस्यासौ मानकामस्य चेर्षोः

    संरम्भिणश्चार्थधर्मातिगस्य ।

दुर्भाषिणो मन्युवशानुगस्य

    कामात्मनो दौर्हृदैर्भावितस्य ॥ १४ ॥

अनेयस्याश्रेयसो दीर्घमन्यो-

    र्मित्रद्रुहः संजय पापबुद्धेः ।

सुतस्य राजा धृतराष्ट्रः प्रियैषी

    प्रपश्यमानः प्राजहाद् धर्मकामौ ॥ १५ ॥

संजय! दूसरोंका मान मिटाकर अपना मान चाहनेवाले, ईर्ष्यालु, क्रोधी, अर्थ और

धर्मका उल्लंघन करनेवाले, कटुवचन बोलनेवाले, क्रोध और दीनताके वशवर्ती, कामात्मा

(भोगासक्त), पापियोंसे प्रशंसित, शिक्षा देनेके अयोग्य, भाग्यहीन, अधिक क्रोधी, मित्रद्रोही

तथा पापबुद्धि पुत्र दुर्योधनका प्रिय चाहनेवाले राजा धृतराष्ट्रने समझते हुए भी धर्म और

कामका परित्याग किया है ॥ १४-१५ ॥

तदैव मे संजय दीव्यतोऽभू-

    न्मतिः कुरूणामागतः स्यादभावः ।

काव्यां वाचं विदुरो भाषमाणो

    न विन्दते यद् धार्तराष्ट्रात् प्रशंसाम् ॥ १६ ॥

संजय! जिस समय मैं जूआ खेल रहा था, उसी समयकी बात है, विदुरजी शुक्रनीतिके

अनुसार युक्ति-युक्त वचन कह रहे थे, तो भी दुर्योधनकी ओरसे उन्हें प्रशंसा नहीं प्राप्त हुई।

तभी मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ था कि सम्भवतः कौरवोंका विनाशकाल समीप आ

गया है ॥ १६ ॥

क्षत्तुर्यदा नान्ववर्तन्त बुद्धिं

    कृच्छ्रं कुरून् सूत तदाभ्याजगाम ।

यावत् प्रज्ञामन्ववर्तन्त तस्य

    तावत् तेषां राष्ट्रवृद्धिर्बभूव ॥ १७ ॥

सूत! जबतक कौरव विदुरजीकी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करते और चलते थे, तबतक

सदा उनके राष्ट्रकी वृद्धि ही होती रही। जबसे उन्होंने विदुरजीसे सलाह लेना छोड़ दिया,

तभीसे उनपर विपत्ति आ पड़ी है ॥ १७ ॥