महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदर्थलुब्धस्य निबोध मेऽद्य ये मन्त्रिणो धार्तराष्ट्रस्य सूत । दुःशासनः शकुनिः सूतपुत्रो गावलगणे पश्य सम्मोहमस्य ॥ १८ ॥ गवल्गणपुत्र संजय! धनके लोभी दुर्योधनके जो-जो मन्त्री हैं, उनके नाम आज तुम मुझसे सुन लो। दुःशासन, शकुनि तथा सूतपुत्र कर्ण—ये ही उसके मन्त्री हैं। उसका मोह तो देखो ॥ १८ ॥
सोऽतं न पश्यामि परीक्षमाणः कथं स्वस्ति स्यात् कुरुसृंजयानाम् । आत्तैश्वर्यो धृतराष्ट्रः परेभ्यः प्रव्राजिते विदुरे दीर्घदृष्टौ ॥ १९ ॥ आशंसते वै धृतराष्ट्रः सपुत्रो महाराज्यमसपत्नं पृथिव्याम् । तस्मिञ्छमः केवलं नोपलभ्यः सर्वं स्वकं मद्गते मन्यतेऽर्थम् ॥ २० ॥ मैं बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई ऐसा उपाय नहीं देखता, जिससे कुरु तथा सृंजयवंश दोनोंका कल्याण हो। धृतराष्ट्र हम शत्रुओंसे ऐश्वर्य छीनकर दूरदर्शी विदुरको देशसे निर्वासित करके अपने पुत्रोंसहित भूमण्डलका निष्कण्टक साम्राज्य प्राप्त करनेकी आशा लगाये बैठे हैं। ऐसे लोभी नरेशके साथ केवल संधि ही बनी रहेगी, (युद्ध आदिका अवसर नहीं आयेगा) यह सम्भव नहीं जान पड़ता; क्योंकि हमलोगोंके वन चले जानेपर वे हमारे सारे धनको अपना ही मानने लगे हैं ॥ १९-२० ॥
यत् तत् कर्णो मन्यते पारणीयं युद्धे गृहीतायुधमर्जुनं वै । आसंश्च युद्धानि पुरा महान्ति कथं कर्णो नाभवद् द्वीप एषाम् ॥ २१ ॥ कर्ण जो ऐसा समझता है कि युद्धमें धनुष उठाये हुए अर्जुनको जीत लेना सहज है, वह उसकी भूल है। पहले भी तो बड़े-बड़े युद्ध हो चुके हैं। उनमें कर्ण इन कौरवोंका आश्रयदाता क्यों न हो सका? ॥ २१ ॥
कर्णश्च जानाति सुयोधनश्च द्रोणश्च जानाति पितामहश्च । अन्ये च ये कुरवस्तत्र सन्ति यथार्जुनान्नास्त्यपरो धनुर्धरः ॥ २२ ॥