भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1831

गजकण्टकसंनद्धं वज्रेणेव शिलोच्चयम् ।
भीष्म कंकपत्रसे युक्त बहुसंख्यक तीखे बाणोंको युद्धमें बिखेर रहे थे। वे एक ही पंखयुक्त सीधे बाणसे लोहेकी झूलसे युक्त हाथीको भी विदीर्ण कर डालते थे। जैसे इन्द्र महान् पर्वतको अपने वज्रसे विदीर्ण कर देते हैं।। ३० ½ ।।
द्वौ त्रीनपि गजारोहान् पिण्डितान् वर्मितानपि ।। ३१ ।।
नाराचेन सुमुक्तेन निजघान पिता तव ।

आपके ताऊ भीष्म अच्छी तरहसे छोड़े हुए एक ही नाराचके द्वारा एक जगह बैठे हुए दो-तीन हाथी-सवारोंको कवच धारण किये होनेपर भी छेद डालते थे ।। ३१ ½ ।।
यो यो भीष्मं नरव्याघ्रमभ्येति युधि कश्चन ।। ३२ ।।
मुहूर्तदृष्टः स मया पतितो भुवि दृश्यते ।

जो कोई भी योद्धा नरश्रेष्ठ भीष्मके सम्मुख आ जाता, वह मुझे एक ही मुहूर्तमें खड़ा दिखायी देकर उसी क्षण धरतीपर लोटता दिखायी देता था ।। ३२ ½ ।।
एवं सा धर्मराजस्य वध्यमाना महाचमूः ।। ३३ ।।
भीष्मेणातुलवीर्येण व्यशीर्यत सहस्रधा ।

इस प्रकार अतुल पराक्रमी भीष्मके द्वारा मारी जाती हुई धर्मराज युधिष्ठिरकी वह विशाल वाहिनी सहस्रों भागोंमें बिखर गयी ।। ३३ ½ ।।
प्राकम्पत महासेना शरवर्षेण तापिता ।। ३४ ।।
पश्यतो वासुदेवस्य पार्थस्याथ शिखण्डिनः ।

उनकी बाण-वर्षासे संतप्त हो पाण्डवोंकी वह महती सेना श्रीकृष्ण, अर्जुन और शिखण्डीके देखते-देखते काँपने लगी ।। ३४ ½ ।।
वर्तमानाऽपि ते वीरा द्रवमाणान् महारथान् ।। ३५ ।।
नाशक्नुवन् वारयितुं भीष्मबाणप्रपीडितान् ।

वे सब वीर वहाँ मौजूद होते हुए भी भीष्मके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर भागते हुए अपने महारथियोंको रोकनेमें समर्थ न हो सके ।। ३५ ½ ।।
महेन्द्रसमवीर्येण वध्यमाना महाचमूः ।। ३६ ।।
अभज्यत महाराज न च द्वौ सह धावतः ।

महाराज! महेन्द्रके समान पराक्रमी भीष्मकी मार खाकर वह विशाल सेना इस प्रकार तितर-बितर हुई कि उसके दो-दो सैनिक भी एक साथ नहीं भाग सकते थे ।। ३६ ½ ।।
आविद्धनरनागाश्वं पतितध्वजकूबरम् ।। ३७ ।।
अनीकं पाण्डुपुत्राणां हाहाभूतमचेतनम् ।

मनुष्य, हाथी और घोड़े सभी बाणोंसे छिद गये थे। रथके ध्वज और कूबर टूटकर गिर चुके थे। इस प्रकार पाण्डवोंकी सेना अचेत-सी होकर हाहाकार कर रही थी ।। ३७ ½ ।।
जघानात्र पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा ।। ३८ ।।