भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1832

प्रियं सखायं चाक्रन्दे सखा दैवबलात्कृतः । इस युद्धमें दैवके वशीभूत होकर पिताने पुत्रको, पुत्रने पिताको और मित्रने प्रिय मित्रको मार डाला ॥ ३८ १/२ ॥ विमुच्य कवचान्यन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः ॥ ३९ ॥ विमुक्तकेशा धावन्तः प्रत्यदृश्यन्त भारत । भारत! पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके बहुत-से सैनिक कवच खोलकर बाल बिखेरे इधर-उधर दौड़ते दिखायी देते थे ॥ ३९ १/२ ॥ तद् गोकुलमिवोद्भ्रान्तमुद्भ्रान्तरथयूथपम् ॥ ४० ॥ ददृशे पाण्डुपुत्रस्य सैन्यमार्तस्वरं तदा । प्रभज्यमानं सैन्यं तु दृष्ट्वा यादवनन्दनः ॥ ४१ ॥ उवाच पार्थं बीभत्सुं निगृह्य रथमुत्तमम् । उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी वह सेना व्याकुल होकर भटकती हुई गौओंके समूहकी भाँति आर्तस्वरसे हाहाकार करती हुई देखी गयी। कितने ही रथयूथपति भी किंकर्तव्यविमूढ़ होकर घूम रहे थे। अपनी सेनामें इस प्रकार भगदड़ मची हुई देख यदुकुलनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अपने उत्तम रथको खड़ा करके कुन्तीपुत्र अर्जुनसे कहा— ॥ ४०-४१ १/२ ॥ अयं स कालः सम्प्राप्तः पार्थ यस्तेऽभिकाङ्क्षितः ॥ ४२ ॥ प्रहरस्व नरव्याघ्र न चेन्मोहाद् विमुह्यसे । ‘पुरुषसिंह! जिसकी तुम दीर्घकालसे अभिलाषा करते थे, वही यह अवसर प्राप्त हुआ है। यदि तुम मोहसे किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं हो गये हो तो पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करो ॥ ४२ १/२ ॥ यत् त्वया कथितं वीर पुरा राज्ञां समागमे ॥ ४३ ॥ भीष्मद्रोणमुखान् सर्वान् धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् । सानुबन्धान् हनिष्यामि ये मां योत्स्यन्ति संयुगे ॥ ४४ ॥ इति तत् कुरु कौन्तेय सत्यं वाक्यमरिंदम । बीभत्सो पश्य सैन्यं स्वं भज्यमानं ततस्ततः ॥ ४५ ॥ ‘वीर! पहले राजाओंकी मण्डलीमें तुमने जो यह कहा था कि ‘जो मेरे साथ संग्रामभूमिमें उतरकर युद्ध करेंगे, दुर्योधनके उन भीष्म, द्रोण आदि समस्त सैनिकोंको मैं सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डालूँगा।’ शत्रुसूदन कुन्तीनन्दन! अपनी उस बातको सत्य कर दिखाओ। अर्जुन! देखो, तुम्हारी सेना इधर-उधर भाग रही है ॥ ४३—४५ ॥ द्रवतश्च महीपालान् पश्य यौधिष्ठिरे बले । दृष्ट्वा हि भीष्मं समरे व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ ४६ ॥ भयार्ताः प्रपलायन्ते सिंहात् क्षुद्रमृगा इव ।