भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1834

थे ।। ५३ ।। ततः पार्थो धनुर्गृह्य दिव्यं जलदनिःस्वनम् । पातयामास भीष्मस्य धनुश्छित्त्वा त्रिभिः शरैः ।। ५४ ।। तब अर्जुनने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले दिव्य धनुषको हाथमें लेकर तीन बाणोंसे भीष्मके धनुषको काट गिराया ।। ५४ ।। स च्छिन्नधन्वा कौरव्यः पुनरन्यन्महद् धनुः । निमिषान्तरमात्रेण सज्यं चक्रे पिता तव ।। ५५ ।। धनुष कट जानेपर आपके ताऊ कुरुनन्दन भीष्मने पलक मारते-मारते पुनः दूसरे विशाल धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ा दी ।। ५५ ।। विचकर्ष ततो दोर्भ्यां धनुर्जलदनिःस्वनम् । अथास्य तदपि क्रुद्धश्छिच्छेद धनुरर्जुनः ।। ५६ ।। फिर मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उस धनुषको दोनों हाथोंसे खींचा। इतनेहीमें कुपित हुए अर्जुनने उनके उस धनुषको भी काट डाला ।। ५६ ।। तस्य तत् पूजयामास लाघवं शान्तनोः सुतः । साधु पार्थ महाबाहो साधु भोः पाण्डुनन्दन ।। ५७ ।। त्वय्येवैतद् युक्तरूपं महत् कर्म धनंजय । प्रीतोऽस्मि सुभृशं पुत्र कुरु युद्धं मया सह ।। ५८ ।। अर्जुनकी इस फुर्तीको देखकर शान्तनुनन्दन भीष्मने बड़ी प्रशंसा की और कहा—'महाबाहु कुन्तीकुमार! तुम्हें साधुवाद। पाण्डुनन्दन! धन्यवाद। बेटा! तुम्हारी इस फुर्तीसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। धनंजय! यह महान् कर्म तुम्हारे ही योग्य है। तुम मेरे साथ युद्ध करो' ।। ५७-५८ ।। इति पार्थं प्रशस्याथ प्रगृह्यान्यन्महद् धनुः । मुमोच समरे वीरः शरान् पार्थरथं प्रति ।। ५९ ।। इस प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुनकी प्रशंसा करके फिर दूसरा विशाल धनुष हाथमें लेकर वीर भीष्मने युद्धस्थलमें उनके रथकी ओर बाण बरसाना आरम्भ किया ।। ५९ ।। अदर्शयद् वासुदेवो हययाने परं बलम् । मोघान् कुर्वन् शरांस्तस्य मण्डलान्यचरल्लघु ।। ६० ।। भगवान् श्रीकृष्णने घोड़ोंको हाँकनेकी कलामें अपने उत्तम बलका परिचय दिया। वे भीष्मके बाणोंको व्यर्थ करते हुए बड़ी फुर्तीके साथ रथको मण्डलाकार चलाने लगे ।। ६० ।। तथा भीष्मस्तु सुदृढं वासुदेवधनंजयौ । विव्याध निशितैर्बाणैः सर्वगात्रेषु भारत ।। ६१ ।।