भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1836

नाश कर सकते हैं। फिर सेना और सेवकोंसहित पाण्डवोंको युद्धमें परास्त करना इनके लिये कौन बड़ी बात है? ।। ६८-६९ ।। द्रवते च महासैन्यं पाण्डवस्य महात्मनः । एते च कौरवास्तूर्णं प्रभग्नान् वीक्ष्य सोमकान् ।। ७० ।। प्राद्रवन्ति रणे दृष्ट्वा हर्षयन्तः पितामहम् । सोऽहं भीष्मं निहन्म्यद्य पाण्डवार्थाय दंशितः ।। ७१ ।। महात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी यह विशाल सेना भागी जा रही है और ये कौरवलोग रणक्षेत्रमें सोमकोंको शीघ्रतापूर्वक भागते देख पितामहका हर्ष बढ़ाते हुए उन्हें खदेड़ रहे हैं; अतः आज पाण्डवोंके लिये कवच धारण किया हुआ मैं स्वयं ही भीष्मको मारे डालता हूँ ।। ७०-७१ ।। भारमेतं विनेष्यामि पाण्डवानां महात्मनाम् । अर्जुनो हि शरैस्तीक्ष्णैर्वध्यमानोऽपि संयुगे ।। ७२ ।। कर्तव्यं नाभिजानाति रणे भीष्मस्य गौरवात् । महामना पाण्डवोंके इस भारी भारको मैं ही दूर करूँगा। अर्जुन इस युद्धमें तीखे बाणोंकी मार खाकर भी भीष्मके प्रति गौरवबुद्धि रखनेके कारण अपने कर्तव्यको नहीं समझ रहा है ।। ७२ १/२ ।। तथा चिन्तयतस्तस्य भूय एव पितामहः । प्रेषयामास संक्रुद्धः शरान् पार्थरथं प्रति ।। ७३ ।। भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार चिन्तन करते समय अत्यन्त कुपित हुए पितामह भीष्मने अर्जुनके रथपर पुनः बहुत-से बाण चलाये ।। ७३ ।। तेषां बहुत्वात् तु भृशं शराणां दिशश्च सर्वाः पिहिता बभूवुः । न चान्तरिक्षं न दिशो न भूमि- र्न भास्करोऽदृश्यत रश्मिमाली । वयुश्च वातास्तुमुलाः सधूमा दिशश्च सर्वाः क्षुभिता बभूवुः ।। ७४ ।। उन बाणोंकी अत्यधिकताके कारण उनसे सम्पूर्ण दिशाएँ आच्छादित हो गयीं। न आकाश दिखायी देता था, न दिशाएँ; न तो भूमि दिखायी देती थी और न मरीचिमाली भगवान् भास्करका ही दर्शन होता था। उस समय धूमयुक्त भयंकर हवा चलने लगी। सम्पूर्ण दिशाएँ क्षुब्ध हो उठीं ।। ७४ ।। द्रोणो विकर्णोऽथ जयद्रथश्च भूरिश्रवाः कृतवर्मा कृपश्च । श्रुतायुरम्बष्ठपतिश्च राजा