महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1840, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस चक्रकी नाभि बड़ी सुन्दर थी। उसका प्रकाश सूर्यके समान और प्रभाव वज्रके तुल्य था। उसके किनारे छूरेके समान तीक्ष्ण थे। वसुदेवनन्दन महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण घोड़ोंकी लगाम छोड़कर हाथमें उस चक्रको घुमाते हुए रथसे कूद पड़े और जिस प्रकार सिंह बढ़े हुए घमंडवाले मदान्ध एवं उन्मत्त गजराजको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर झपटे, उसी प्रकार वे भी अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कँपाते हुए युद्धस्थलमें भीष्मकी ओर बड़े वेगसे दौड़े ॥ ८८-८९ ॥
सोऽभिद्रवन् भीष्ममनीकमध्ये क्रुद्धो महेन्द्रावरजः प्रमाथी । व्यालम्बीपीतान्तपटश्चकाशे घनो यथा खे तडितावनद्धः ॥ ९० ॥
देवराज इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्ण समस्त शत्रुओंको मथ डालनेकी शक्ति रखते थे। वे उस सेनाके मध्यभागमें कुपित होकर जिस समय भीष्मकी ओर झपटे, उस समय उनके श्याम विग्रहपर लटककर हवाके वेगसे फहराता हुआ पीताम्बरका छोर उन्हें ऐसी शोभा दे रहा था, मानो आकाशमें बिजलीसे आवेष्टित हुआ श्याम मेघ सुशोभित हो रहा हो ॥ ९० ॥
सुदर्शनं चास्य रराज शौरे- स्तच्चक्रपद्मं सुभुजोरुनालम् । यथादिपद्मं तरुणार्कवर्णं रराज नारायणनाभिजातम् ॥ ९१ ॥
श्रीकृष्णकी सुन्दर भुजारूपी विशाल नालसे सुशोभित वह सुदर्शनचक्र कमलके समान शोभा पा रहा था, मानो भगवान् नारायणके नाभिसे प्रकट हुआ प्रातःकालीन सूर्यके समान कान्तिवाला आदिकमल प्रकाशित हो रहा हो ॥ ९१ ॥
तत् कृष्णकोपोदयसूर्यबुद्धं क्षुरान्ततीक्ष्णाग्रसुजातपत्रम् । तस्यैव देहोरुसरः प्ररूढं रराज नारायणबाहुनालम् ॥ ९२ ॥
श्रीकृष्णके क्रोधरूपी सूर्योदयसे वह कमल विकसित हुआ था। उसके किनारे छूरेके समान तीक्ष्ण थे। वे ही मानो उसके सुन्दर दल थे। भगवान्के श्रीविग्रहरूपी महान् सरोवरमें ही वह बढ़ा हुआ था और नारायणस्वरूप श्रीकृष्णकी बाहुरूपी नाल उसकी शोभा बढ़ा रही थी ॥ ९२ ॥
तमात्तचक्रं प्रणदन्तमुच्चैः क्रुद्धं महेन्द्रावरजं समीक्ष्य । सर्वाणि भूतानि भृशं विनेदुः