भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1841

क्षयं कुरूणामिव चिन्तयित्वा ॥ ९३ ॥ महेन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्ण कुपित हो हाथमें चक्र उठाये बड़े जोरसे गरज रहे थे। उन्हें इस रूपमें देखकर कौरवोंके संहारका विचार करके सभी प्राणी हाहाकार करने लगे ॥ ९३ ॥

स वासुदेवः प्रगृहीतचक्रः संवर्तयिष्यन्निव सर्वलोकम् । अभ्युत्पतँल्लोकगुरुर्बभासे भूतानि धक्ष्यन्निव धूमकेतुः ॥ ९४ ॥ वे जगद्गुरु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण हाथमें चक्र ले मानो सम्पूर्ण जगत्‌का संहार करनेके लिये उद्यत थे और समस्त प्राणियोंको जलाकर भस्म कर डालनेके लिये उठी हुई प्रलयाग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ९४ ॥

तमाद्रवन्तं प्रगृहीतचक्रं दृष्ट्वा देवं शान्तनवस्तदानीम् । असम्भ्रमं तद् विचकर्ष दोर्भ्यां महाधनुर्गाण्डिवतुल्यघोषम् ॥ ९५ ॥ भगवान्‌को चक्र लिये अपनी ओर वेगपूर्वक आते देख शान्तनुनन्दन भीष्म उस समय तनिक भी भय अथवा घबराहटका अनुभव न करते हुए दोनों हाथोंसे गाण्डीव धनुषके समान गम्भीर घोष करनेवाले अपने महान् धनुषको खींचने लगे ॥ ९५ ॥

उवाच भीष्मस्तमनन्तपौरुषं गोविन्दमाजावविमूढचेताः । एह्येहि देवेश जगन्निवास नमोऽस्तु ते माधव चक्रपाणे ॥ ९६ ॥ प्रसह्य मां पातय लोकनाथ रथोत्तमात् सर्वशरण्य संख्ये ॥ ९७ ॥ उस समय युद्ध स्थलमें भीष्मके चित्तमें तनिक भी मोह नहीं था। वे अनन्त पुरुषार्थशाली भगवान् श्रीकृष्णका आह्वान करते हुए बोले—'आइये, आइये, देवेश्वर! जगन्निवास! आपको नमस्कार है। हाथमें चक्र लिये आये हुए माधव! सबको शरण देनेवाले लोकनाथ! आज युद्धभूमिमें बलपूर्वक इस उत्तम रथसे मुझे मार गिराइये ॥ ९६-९७ ॥

त्वया हतस्यापि ममाद्य कृष्ण श्रेयः परस्मिन्निह चैव लोके । सम्भावितोऽस्म्यन्धकवृष्णिनाथ लोकैस्त्रिभिर्वीर तवाभियानात् ॥ ९८ ॥