भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1843

पुत्रैः शपे केशव सोदरैश्च । अन्तं करिष्यामि यथा कुरूणां त्वयाहमिन्द्रानुज सम्प्रयुक्तः ॥ १०३ ॥ 'केशव! अब मैं अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार कर्तव्यका पालन करूँगा, उसका त्याग कभी नहीं करूँगा। यह बात मैं अपने पुत्रों और भाइयोंकी शपथ खाकर कहता हूँ। उपेन्द्र! आपकी आज्ञा मिलनेपर मैं समस्त कौरवोंका अन्त कर डालूँगा' ॥ १०३ ॥

ततः प्रतिज्ञां समयं च तस्य जनार्दनः प्रीतमना निशम्य । स्थितः प्रिये कौरवसत्तमस्य रथं सचक्रः पुनरारुरोह ॥ १०४ ॥ अर्जुनकी यह प्रतिज्ञा और कर्तव्य-पालनका यह निश्चय सुनकर भगवान् श्रीकृष्णका मन प्रसन्न हो गया। वे कुरुश्रेष्ठ अर्जुनका प्रिय करनेके लिये उद्यत हो पुनः चक्र लिये रथपर जा बैठे ॥ १०४ ॥

स तानभीषून् पुनराददानः प्रगृह्य शङ्खं द्विषतां निहन्ता । निनादयामास ततो दिशश्च स पाञ्चजन्यस्य रवेण शौरिः ॥ १०५ ॥ शत्रुओंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने पुनः घोड़ोंकी बागडोर सँभाली और पांचजन्य शंख लेकर उसकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित कर दिया ॥ १०५ ॥

व्याविद्धनिष्काङ्गदकुण्डलं तं रजोविकीर्णाञ्चितपद्मनेत्रम् । विशुद्धदंष्ट्रं प्रगृहीतशङ्खं विचुक्रुशुः प्रेक्ष्य कुरुप्रवीराः ॥ १०६ ॥ उस समय उनके कण्ठका हार, भुजाओंके बाजू-बन्द और कानोंके कुण्डल हिलने लगे थे। उनके कमलके समान सुन्दर नेत्रोंपर सेनासे उठी हुई धूल बिखरी थी। उनकी दन्तावली शुद्ध एवं स्वच्छ थी और उन्होंने अपने हाथमें शंख ले रखा था। उस अवस्थामें श्रीकृष्णको देखकर कौरवपक्षके प्रमुख वीर कोलाहल कर उठे ॥ १०६ ॥

मृदङ्गभेरीपणवप्रणादा नेमिस्वना दुन्दुभिनिःस्वनाश्च । ससिंहनादाश्च बभूवुरुग्राः सर्वेष्वनीकेषु ततः कुरूणाम् ॥ १०७ ॥ तत्पश्चात् कौरवोंके सम्पूर्ण सैन्यदलोंमें मृदंग, भेरी पणव तथा दुन्दुभिकी ध्वनि होने लगी। रथके पहियोंकी घरघराहट सुनायी देने लगी। वे सभी शब्द वीरोंके सिंहनादसे